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ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)

( 2122 2122 2122 )

हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की
काश हम भी काटते फसलें ख़ुशी की

अब चुरा लो शम्स की भी धूप सारी

कोई तो बदलो  ये सूरत तीरगी की

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में
नस्ल घटती जा रही है आदमी की

हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद सारे
कौन खींचेगा लकीरें रौशनी की

जो भी हो सागर मिलेगा तिश्नगी को
बाढ़ ले जाये हमें अब तो नदी की

आंखेंं फट जाएँगी हैरत से तुम्हारी
हद अभी देखी नहीं दीवानगी की

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by नादिर ख़ान on May 21, 2020 at 11:45pm

आदरणीय सालिक गणवीर जी अच्छी गज़ल कही आपने, हमेशा की तरह समर साहब ने खूब इस्लाह की ... बधाई 

Comment by सालिक गणवीर on May 20, 2020 at 6:06pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह'कुशक्षत्रप'जी
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती एवं सराहना के लिए हार्दिक आभार.
Comment by नाथ सोनांचली on May 20, 2020 at 4:05pm

आद0 सालिक गणवीर जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। बधाई स्वीकारिये। यह शेर खास पसन्द आया

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में
नस्ल घटती जा रही है आदमी की

Comment by सालिक गणवीर on May 19, 2020 at 10:58am

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

सादर प्रणाम

सराहना के लिए हृदय से आभार.

Comment by सालिक गणवीर on May 19, 2020 at 10:54am

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी

सादर प्रणाम

सराहना के लिए आपका हृदय से आभारी हूँँ.

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 18, 2020 at 9:54pm

खूबसूरत ग़ज़ल ,बधाई स्वीकारें साहेब 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2020 at 12:23pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सालिक गणवीर on May 16, 2020 at 5:08pm
आदरणीय समर कबीर साहब
आदाब
आपकी क़ीमती सलाह और मार्ग दर्शन के लिए तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. ज़रुरी बदलाव के साथ ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ.
Comment by Samar kabeer on May 16, 2020 at 12:07pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'धूप थोड़ी सी चुराओ शम्स की भी
अब तो बदलो कोई सूरत तीरगी की'

इस शैर में कसावट नहीं है,ऊला और चुस्त करने की कोशिश करें ।

'जानवर जंगल में ज़्यादा हो गए हैं'

आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि उर्दू के लिहाज़ से सहीह शब्द "ज़ियादा" 122 है,और ग़ज़लों में इसी वज़्न को लेना उचित होता है,जैसे:-

'चलके तेरी आँखों से शराब और ज़ियादा'

'हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद अब भी'

इस मिसरे में 'अब भी' की जगह "सारे" या "सब ही" शब्द उचित होगा ।

'आंख बाहर आ गई हैरत से कल भी
हद अभी देखी नहीं दीवानगी की'

सानी में जब ' देखी नहीं' तो ऊला में 'आ गई' शब्द कैसे ले सकते हैं,ऊला इस तरह का होना चाहिए:-

'आँखें फट जाएँगी हैरत से तुम्हारी'

Comment by सालिक गणवीर on May 15, 2020 at 7:47pm
आदरणीय समर कबीर साहब
आदाब
अपनी नयी ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ. वक़्त मिलने से एक पढ़ लें तो इनायत होगी.

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