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युद्ध और साम्राज्य 2

पुराने ज़माने की बात है ।
        दो पङोसी देशों मे आपस सहयोग बढने लगा था । कहते हैं कि जब सहयोग बढता है तो परस्पर विश्वास जनम लेता है और विश्वास से प्रेम । प्रेम से मेल जोल बढता है और मेलजोल से खुशहाली आती है । लेकिन खुशहाल प्रजा भलीभांति शासित नही होती । क्योंकि खुशहाल व्यक्ति सम्पन्न होता है और समपन्न ही शक्तिशाली । फिर शक्तिशाली तो शासन ही करता है , उसे शासित नही किया जा सकता । गडरिया तो भेड़ों  के झुंड को ही चराता है , कभी शेरों के झुंड को चराते किसी को देखा गया है क्या ?
       इन सब विचारों के वशीभूत, दोनो देशों के शासक चिंतित रहने लगे ।
       एक दिन दोनो शासकों ने आपस मे मंत्रणा की और आपस मे युद्ध के द्वारा जनता को गुमराह किया । 
       अब वे दोनो प्रसन्न थे । जनता युद्ध का बोझ उठाती रही, जनता अपनी श्रेष्ठ संतान युद्ध की भेंट चढ़ाती रही । लेकिन दोनो देशों की जनता ने आज तक नहीँ पूछा कि हमारी आपस में क्या दुश्मनी है । दोनो शासक मुस्कुराते रहे, कि हम सुरक्षित हैं । 
       लेकिन प्रजा ने कभी नहीं सोचा कि यह परंपरा कब तक चलती रहेगी । शायद यह अच्छी प्रजा की निशानी है ।

 

 

***

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 15, 2018 at 3:24am

दो पड़ोसी शासकों के स्वार्थपूर्ण रवैये और फैसलों और मासूम सी निर्दोष जनता पर मानसिक, आर्थिक ज़ुल्म-ओ-सितम को मिश्रित लघुकथा शैली में उभारती बेहतरीन भावपूर्ण, यथार्थपूर्ण रचना। आपकी अपनी विशिष्ट शैली। हार्दिक बधाई मुहतरम जनाब मिर्ज़ा ह़ाफ़िज़ बेग  साहिब।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 22, 2018 at 10:48am

बहुत खूब..

Comment by नाथ सोनांचली on March 22, 2018 at 6:04am

जनाब मिर्जा हाफिज जी सादर अभिवादन। पुनः एक बेहतरीन और शशक्त लघुकथा। बहुत बहुत बधाई जनाब। सादर

Comment by Samar kabeer on March 21, 2018 at 6:15pm

जनाब मिर्ज़ा हफ़ीज़ बैग साहिब आदाब,बहुत ख़ूब वाह, शानदार प्रस्तुति,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Ajay Tiwari on March 21, 2018 at 5:17pm

आदरणीय हफ़ीज़ साहब, एक और सशक्त लघुकथा के लिए. हार्दिक बधाई.

Comment by somesh kumar on March 21, 2018 at 11:25am

lghuktha me lekhak ka vishleshn ise km prbhavi krta lgta hai.ise ingit me hona chahie. khani me ye chal skta hai .aap ङ ka pyryog glt kr rhe hain yh pnchm vrn hai ang k rup me bola jata hai kripya  ड़ का pryog करें 

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