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'ग़ालिब' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2'

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फेलुन

लोग हैरान थे,रिश्ता सर-ए-महफ़िल बाँधा

उसने जब अपनी रग-ए-जाँ से मेरा दिल बाँधा

हर क़दम राह मलाइक ने दिखाई मुझ को

मैंने जब अज़्म-ए-सफ़र जानिब-ए-मंज़िल बाँधा

जितने हमदर्द थे रोने लगे सुनकर देखो

अपने अशआर में जब मैंने ग़म-ए-दिल बाँधा

जल गये जितने सितारे थे फ़लक पर यारो

अपनी ज़ुल्फ़ों में जब उसने मह-ए-कामिल बाँधा

शुक्र तेरा करें किस मुंह से बता ऐ यारब

तूने चाहत की रसन से हमें शामिल बाँधा

तुझ पे क़ुर्बान मुसव्विर तेरे फ़न पर क़ुरबाँ

तूने मंज़र मेरे मिट जाने का तिल-तिल बाँधा

कर्बला वालों की तारीख़ "समर" याद आई

उसने जब तिश्ना लबों को लब-ए-साहिल बाँधा

-----

मलाइक--फ़रिश्ते

फ़लक--आकाश

मह-ए-कामिल--पूरा चाँद

रसन--रस्सी

मुसव्विर--चित्रकार

तिश्ना लबों--प्यासों

लब-ए-साहिल--किनारे

'समर कबीर'

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 28, 2018 at 4:46pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय..हरेक शेर लाजबाब
जितने हमदर्द थे रोने लगे सुनकर देखो
अपने अशआर में जब मैंने ग़म-ए-दिल बाँधा..बेहतरीन

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 12:06pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 12:04pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 12:03pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 12:01pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 11:59am

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

आइन्दा अरकान के साथ 2122 भी लिख दिया करूँगा,आपकी आसानी के लिये ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 11:54am

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,आपकी प्रतिक्रया पाकर मुग्ध हूँ,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2018 at 11:50am

जनाब अजय तिवारी साहिब आदाब,मतला और मक़्ता आपको पसंद आया,लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by TEJ VEER SINGH on March 28, 2018 at 11:22am

हार्दिक बधाई आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब।बेहतरीन गज़ल।

जितने हमदर्द थे रोने लगे सुनकर देखो

अपने अशआर में जब मैंने ग़म-ए-दिल बाँधा

Comment by Mohammed Arif on March 28, 2018 at 10:29am

शुक्र तेरा करें किस मुंह से बता ऐ यारब

तूने चाहत की रसन से हमें शामिल बाँधा वाह! वाह!!  बहुत ही उम्दा शे'र ।

           शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

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