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बूंद-बूंद ही भरता घड़ा (लघुकथा) ["सुख"-विषयांतर्गत -1]/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

वे दोनों अपने आप को उच्च शिक्षित, व्यवहारिक, और मानवता के पैरोकार साबित करने पर तुले हुए थे। बहस का कोई अंत नहीं था। एक-दूसरे से सहमत होना मुश्किल था। अंतिम प्रयास करते हुए उनमें से एक बोला- "मैंने सभी धार्मिक ग्रंथों के साथ ही मानव समाज से संबंधित सभी विषयों पर पर्याप्त अध्ययन और चिंतन-मनन किया है। निष्कर्षत: अब मैं मानवता के मार्ग पर चलना चाहता हूं।"

"तो क्या अब तक दानव बनकर जी रहे थे!" दूसरे ने लगभग चीखते हुए कहा।

"नहीं, ढोंगी मानवता की चादर ओढ़े हुए दानवता की ढाल लिए लोगों के साथ रहते हुए सामंजस्य स्थापित करते हुए उन जैसा ही जीवन जी रहा था! तुम बताओ मेरी वाली पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों को पढ़े बिना तुम कैसे जी रहे हो!"

"प्रकृति मेरी पुस्तक है, मेरी गुरु है, मेरा आदर्श है और वही मेरा ईश्वर और धर्म है, समझे!" फिर से उसने चिल्ला कर कहा।

"तो क्या तुम मानवता सीख गये? साधु-संत बन गये या लेखक, दार्शनिक वग़ैरह या सिर्फ़ फकीर, मुफ़लिस बन कर रह गए?" व्यंग्योक्ति के साथ पहले ने कहा।

"कुछ भी समझ लो, लेकिन हर कोई अंततः जिस चीज़ के लिए तड़पता है, वह मुझे हासिल हुआ है, भले आंशिक ही क्यों न हो! बूंद-बूंद से घड़ा भरता है शांति और सुकून का भी!" अब की बार दूसरा बड़ी शांति और संतुष्टि के साथ बोला।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 16, 2017 at 5:44pm
मुहतरम जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब,सीख देती बहुत सुंदर लघुकथा हुई है,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Mohammed Arif on July 16, 2017 at 5:09pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, लघुकथा के सारे मापदंडों पर खरी लघुकथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 3:59pm

बहुत बढ़िया , वाकई प्रकृति से बड़ी कोई पुस्तक नहीं है ,इस रचना पर बधाई आपको आदरणीय  Sheikh Shahzad Usmani साहब ! सादर 

Comment by KALPANA BHATT on July 16, 2017 at 3:27pm

अच्छी कथा हुई है आदरणीय शहजाद जी | हार्दिक बधाई 

Comment by Samar kabeer on July 16, 2017 at 3:25pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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