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'कि भाई भाई का दुश्मन है क्या किया जाए'

ग़ज़ल
1212 1122 1212 22 / 112

यही समाज की उलझन है क्या किया जाए
कि भाई भाई का दुश्मन है क्या किया जाए

हर एक शख़्स गरानी के दौर में देखो
ख़ुद अपने आप से बदज़न है क्या किया जाए

सभी ये कहते हैं यारो हम आशिक़ों के लिये
ये शब अज़ल ही से बैरन है क्या किया जाए

सफ़र प जाने से पहले ये सोचना है हमें
हर एक गाम प रहज़न है क्या किया जाए

जो तू नहीं है तो तेरे बग़ैर ऐ जानम
बहुत उदास ये मधुबन है क्या किया जाए

ये सोच सोच के दिल मेरा बैठा जाता है
ख़फ़ा फिर आज वो चितवन है क्या किया जाए

'समर' ख़ुशी का तसव्वुर करें तो कैसे करें
क़दम क़दम यहाँ शेवन है क्या किया जाए

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 3, 2021 at 4:15pm

मुहतरम कबीर साहिब आदाब, जी बेशक, दुरुस्त फ़रमाया आपने। वज़ाहत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।  सादर। 

Comment by Chetan Prakash on August 3, 2021 at 3:28pm

आदाब, आदरणीय समर कबीर साहब नमन, टंकण में कुछ भूल हुई, मेरा  आशथ , मौसम  सम्बंधित कुछ जैसे, कानन, अथवा, प्रेयसी इंगित बिम्ब है, तो आपकी  भाषानुसार 'जोबन ( यौवन ) ! सादर  

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 3:01pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 3:00pm

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

//लगता है, छठे शे'र में, 'चितवन' के बजाए 'मौसम' बहतर होता! //

भाई, 'चितवन' क़ाफ़िया है, इसकी जगह 'मौसम' शब्द कैसे ले सकता है:-)))

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 2:56pm

जनाब अमीरुद्दीन 'अमीर' जी आदाब, ग़ज़ल आप बहुत ग़ौर से पढ़ते हैं,आपकी ये आदत मुझे पसंद है ।

//जो तू नहीं है तो तेरे बग़ैर  जानम' में लफ़्ज़ 'ऐ जानम' पर एक बार फिर से विचार किया जा सकता है क्या?//

इस मिसरे पर सिर्फ़ इतना कहूँगा कि ये तख़ातुब ख़त में भी हो सकता है,और फ़ोन पर होने वाली गुफ़्तगू में भी, इसलिये मेरी दानिस्त में ठीक है ।

ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 2:50pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

Comment by Samar kabeer on August 3, 2021 at 2:49pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 3, 2021 at 7:32am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । मतले से मक्ते तक एक से एक शेर हुए हैं। एक और सदाबहार गजल के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकारें । 

Comment by Chetan Prakash on August 3, 2021 at 4:55am

और हां.... सादर प्रणाम, आनंदातिरेक, आदरणीय क्षमा करें, औपचारिकता भूल गया था, सादर.. 

Comment by Chetan Prakash on August 3, 2021 at 4:28am

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है, मज़ा गया! ! आदरणीय लगता है, छठे शे'र में, 'चितवन' के बजाए 'मौसम' बहतर होता! 

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