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ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

बह्र : 1222 1222 122

तुम्हारे शहर से मैं जा रहा हूँ

बिछड़ने से बहुत घबरा रहा हूँ

 

वहाँ दुनिया को तू अपना रही है

यहाँ दुनिया को मैं ठुकरा रहा हूँ

 

उठा कर हाथ से ये लाश अपनी

मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

 

तुम्हारे इश्क़ में बन कर मैं काँटा

सभी की आँख में चुभता रहा हूँ

 

नहीं मालूम जाना है कहाँ पर

न जाने मैं कहाँ से आ रहा हूँ

 

मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसे

तुम्हीं से रात दिन लड़ता रहा हूँ

 

पढ़ा इक लफ़्ज़ भी उसने ने मेरा

ग़ज़ल जिसके लिए लिखता रहा हूँ

 

मुहब्बत करने वाले मर गए हैं

मैं दिल को कब से ये समझा रहा हूँ

 

नहीं आया मुझे वो रोकने को

उसे मालूम है मैं जा रहा हूँ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 11:36am

'मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसे

तुम्हीं से रात दिन लड़ता रहा हूँ'

बहुत खूब!

आदरणीय महेंद्र जी, ख़ूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 27, 2019 at 3:49pm

क्या बात है लाजवाब | समर सर की इस्लाह भी लाजवाब | 

Comment by दिगंबर नासवा on February 20, 2019 at 12:17pm

उम्दा ग़ज़ल और लाजवाब शेर ...

बहुत बधाई 

Comment by Balram Dhakar on February 11, 2019 at 10:56pm

आदरणीय महेंद्र जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है। बहुत बहुत बधाई, इस शानदार ग़ज़ल के लिए।

सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on February 2, 2019 at 4:09pm

आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। आद0 समर कबीर साहब की इस्लाह भी उत्तम। बहुत बहुत बधाई आपको इस सृजन पर

Comment by Samar kabeer on February 1, 2019 at 9:53pm

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'वहाँ दुनिया को तू अपना रही है'

इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:-

'वहाँ दुनिया को तुम अपना रहे हो'

कारण ये कि उर्दू शाइरी में महबूब को स्त्रीलिंग नहीं लेते ।

'उठा कर हाथ से ये लाश अपनी'

इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:-

'उठा कर लाश ये हाथों से अपने'

कारण ये कि एक हाथ से लाश उठाना मुमकिन नहीं ।

'पढ़ा इक लफ़्ज़ भी उसने ने मेरा'

इस मिसरे में 'ने' को "न" कर लें ।

Comment by Surkhab Bashar on February 1, 2019 at 9:50am

जनाब महेंद्र कुमार जी, आदाब उम्दा ग़ज़ल के लिये मुबारक बाद कुबूल करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2019 at 6:20am

आ. भाई महेंद्र जी, अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

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