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ग़ज़ल नूर की -कुछ थे अधूरे काम सो आना पड़ा हमें.

.

कुछ थे अधूरे काम सो आना पड़ा हमें.
फ़ानी बदन में ख़ुद को समाना पड़ा हमें
.
जश्न-ए-जहान था ही नहीं अपने वास्ते
आ ही गए तो जश्न मनाना पड़ा हमें.
.

फिर जब पहेली मौत की हल हो नहीं सकी
मजबूरी में ख़ुदा को बनाना पड़ा हमें.
.
बाहर कहीं जो रब का पता मिल नहीं सका  
वापस फिर अपने आप में आना पड़ा हमें.
.
फिर अपनी ख़ाक ही से न उगने लगे कहीं
सो हम जो मर गए तो जलाना पड़ा हमें.
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 4, 2024 at 2:27pm

आभार आ. सौरभ सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 4, 2024 at 2:27pm

आभार आ. लक्षमण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 1, 2024 at 10:58pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 14, 2024 at 11:47pm

फिर अपनी ख़ाक ही से न उगने लगे कहीं
सो हम जो मर गए तो जलाना पड़ा हमें.

क्या-क्या सोच लेते हैं, आप भी !  .. जय हो.. 

शुभातिशुभ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 19, 2024 at 12:00pm

धन्यवाद आ. आज़ी तमाम भाई 

Comment by Aazi Tamaam on January 18, 2024 at 6:18am

जी बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई आ नूर साहिब बधाई 🙏

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