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तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२१/२


लिखना न मेरा नाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में
आयेगा कुछ न काम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।१।
**
सबको पता है धूल से बढ़कर न मैं रहा कभी
ऊँचा भले ही दाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।२।
**
सूरज न उगता भोर का तारों भरी न रात हूँ
ढलती हुई सी शाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।३।
**
रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ
करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।४।
**
चाहत न कोई नाम की रिश्ता अगर बना कोई
चलना मुझे अनाम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।५।
**
मुझको सफर मिला हैं अभी दूर चाँद देश का
होगा  नहीं  विराम  तेरे  ख्वाहिशों के शह्र में।६।
*
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक.अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 9:51am

भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर ' जी

सादर अभिवादन

एक और उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक शुभकामनाएँँ.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2020 at 7:28pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 10, 2020 at 10:37am

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