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ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी
हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में
मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से
हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 
उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे
ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभी

मंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो
है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभी

क्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ
सूरज है सर पे देख हुई दोपहर अभी

* मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by Samar kabeer on July 4, 2020 at 3:01pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

बहुत कुछ तो जनाब रवि भसीन जी बता चुके हैं,संज्ञान लें ।

'आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी'

इस मिसरे में हालाँकि 'वफ़ात' का अर्थ मौत होता है,लेकिन इसके लिए 'आएगी' का प्रयोग उचित नहीं,इसके लिए 'वफ़ात पाना' ,'वफ़ात होना' जैसे शब्दों का प्रयोग उचित होता है,ऊला यूँ कर सकते हैं:-

'जाना है एक दिन तो न कर फ़िक्र तू अभी'

'हमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी'

इस मिसरे में 'जी' शब्द भर्ती का है,इसे यूँ कर सकते हैं:-

'हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी'

'सच बोलने की अब सज़ा मिल जाएगी उसे'

इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:-

'सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी'

'हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं कहकहे'--"क़हक़हे"

'मंज़िल बुला रही है मुझे कब से बारहा'

इस मिसरे में 'कब से' के साथ "बारहा" शब्द उचित नहीं, "दोस्तो" कर सकते हैं ।


'है मेरे इंतजार में सूनी डगर अभी'--"इन्तिज़ार"

पारिवारिक कारणों से कुछ समय ओबीओ पर हाज़िर नहीं हो सकूँगा,सिर्फ़ तरही मुशाइर: में शिर्कत हो सकेगी, आपको कहीं मेरी ज़रूरत महसूस हो तो फ़ोन पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 4, 2020 at 12:23pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत अच्छे अशआर हुए हैं जनाब, मुबारकबाद क़ुबूल करें। बस ग़ज़ल का मतला थोड़ा खटक रहा है।

/आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी
हँस,खेल,मुस्कुरा तू किसी से न डर अभी/
आदरणीय, सब्र उस चीज़ के लिए करने की सलाह दी जाती है जिसे पाने के लिए हम आतुर होते हैं, उस चीज़ के लिए नहीं जिससे हम डरते हैं और नहीं चाहते कि हमें मिले। मतले के लिए एक सुझाव पेश कर रहा हूँ:
221 / 2121 / 1221 / 212
जाना है एक दिन न मगर फ़िक्र कर अभी
हँस खेल मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

/आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में
मर-मर के जी रहे हैं यहाँ पर बशर अभी/
सानी में 'पर' के स्थान पर 'क्यूँ' कह कर देखिएगा, शायद आपको ज़ियादा उचित लगे।

/हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट से
हमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी/
आदरणीय, 'जाए' की बजाए 'जाएँ' कहना मुनासिब होगा।
ये अशआर देखिएगा:
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल
हम वो नहीं कि जिनको ज़माना बना गया
(जिगर मुरादाबादी)

हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे
(शेख़ इब्राहीम ज़ौक़)

वो हम नहीं जिन्हें सहना ये जब्र आ जाता
तिरी जुदाई में किस तरह सब्र आ जाता
(परवीन शाकिर)

Comment by सालिक गणवीर on July 3, 2020 at 8:40am

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ.सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2020 at 8:28am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं कहकहे
ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभी

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