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अहसास की ग़ज़ल: मनोज अहसास

2122  2122  2122  212

आदमी को आदमी से डर के बचता देखकर
अपना चेहरा ढक रहे हैं शहर ठहरा देखकर

ढूंढ कर ला दे कोई मुझको मेरे वो आइने
जिनमें तुझको देखता था अपना चेहरा देखकर

इससे बेहतर ज़िन्दगी का और क्या मकसद रहे
आदमी ज़िंदा रहे दुनिया को हँसता देखकर

हाथ को छूकर निकल जाता है मेरे हाथ से
मेरा मन घबरा गया है बहता दरिया देखकर

आपकी बातों पे मुझको अब यकीं बिल्कुल नहीं
आग को झुठला रहे हैं घर भी जलता देखकर

जिसके आँगन में खिले फूलों को कुदरत खा गई
उसको कैसे हो तसल्ली जल बरसता देखकर

हम नहीं थे तेरे साथी सिर्फ अनुगामी ही थे
भीड़ में खोए हुए हैं तुझको खोया देखकर

मेरी अच्छी ज़िन्दगी के साक्षी वो कुछ खतूत
आज झूठे पड़ गए हैं हर नतीजा देखकर

तू ही मेरी उलझनों का हल कोई दे दे ख़ुदा
कुछ समझ आता नहीं सब कुछ बिगड़ता देखकर

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on July 3, 2020 at 8:53pm

 आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफजाई के लिए हार्दिक आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 2:59pm

आ. भाई मनोज जी, सादर अभिवादन । गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई ।

Comment by मनोज अहसास on June 29, 2020 at 11:16am

हार्दिक आभार आदरणीय

आपकी कृपा से जल्दी ही सीख जाऊँगा सर

Comment by Samar kabeer on June 24, 2020 at 2:54pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

आख़िर उर्दू शब्दों में नुक़्ते लगाना कब सीखेंगे?

कृपया ध्यान दे...

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