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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – September 2021 Archive (7)

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२



न दे साथ जग  तो अकेला बना

नया अपने दम पर जमाना बना।१।

*

थका हूँ जतन कर यहाँ मैं बहुत

कि घर मेरा तू ही शिवाला बना।२।

*

तुझे अपना कहते बितायी सदी

न  ऐसे तो पल  में  पराया बना।३।

*

यहाँ सच की बातें तो अपराध हैं

यही सोच खुद को न झूठा बना।४।

*

बड़ों के दिलों में भरा दोष अब

स्वयं को तनिक एक बच्चा बना।५।

*

बहुत दम है साथी कहन में मगर

नहीं अपने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 27, 2021 at 6:45am — 7 Comments

ओजोन दिवस के दोहे

परत घटे ओजोन की, बढ़े धरा का ताप

काटे हम ने पेड़ जो, बने वही अभिशाप।१।

*

छन्नी सा  ओजोन  ही,  छान  रही  है धूप

घातक किरणें रोक जो, करती सुंदर रूप।२।

*

गोला सूरज आग का, विकिरण से भरपूर

पराबैंगनी  ज्वाल  को, ओजोन  रखे  दूर।३।

*

जीवन है ओजोन से, करो न इस को नष्ट

बिन इसके धरती सहित होगा सबको कष्ट।४।

*

क्लोरोफ्लोरोकार्बन,  है जिन की सन्तान

एसी फ्रिज ये उर्वरक, दें उसको नुकसान।५।

*

कर इनका उपयोग कम, करना अच्छा काम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2021 at 5:30pm — 4 Comments

निज भाषा को जग कहे (दोहा गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

निज भाषा को जग कहे, जीवन की पहचान

मिले नहीं इसके बिना, जन जन को सम्मान।१।

*

बड़ा सरल पढ़ना जिसे, लिखना भी आसान

पुरखों से हम को मिला, हिन्दी का वरदान।२।

*

हिन्दी के प्रासाद का, वैज्ञानिक आधार

तभी बनी है आज ये, भाषा एक महान।३।

*

जैसे  धागा  प्रेम  का, बाँध  रखे  परिवार

उत्तर से दक्षिण तलक, एका की पहचान।४।

*

नियमों में बँधकर रहे, हिन्दी का हर रूप

भाषाओं में हो गयी, इस से यह विज्ञान।५।

*

गूँजे चाहे विश्व  में, हिन्दी  कितना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:08pm — 3 Comments

एक दोहा गज़ल - प्रीत - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

एक दोहा गज़ल - प्रीत -(प्रथम प्रयास )

छूट गयी जब  से  यहाँ, सहज  प्रेम की रीत

आती तन की वासना, बनकर मन का मीत।१।

*

चलते फिरते तन करे, जब  तन से मनुहार

मन को तब झूठी लगे, मन की सच्ची प्रीत।२।

*

एक समय जब स्नेह में, जाते थे जग हार

आज सुवासित वासना, चाहे केवल जीत।३।

*

भरे सदा ही  प्रीत ने, ताजे तन मन घाव

प्रेम रहित जो हो गये, खोले घाव अतीत।४।

*

मण्डी जब  से  देह को, कर  बैठे हैं लोग

मन से मन के मध्य में, आ पसरी है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2021 at 11:25am — 6 Comments

चर्चा प्रलय की करती हैं धर्मों की पुस्तकें -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२



नफरत ने जो दिया वो मुहब्बत न दे सकी

हमको सफलता  यार  इनायत न दे सकी।१।

*

चर्चा प्रलय की करती हैं धर्मों की पुस्तकें

पापों को किन्तु अन्त कयामत न दे सकी।२।

*

बूढ़े हुए  हैं  लोग  जो  चाहत  में  स्वर्ग के

कह दो उन्हें कि मौत भी जन्नत न दे सकी।३।

*

सोचा था एक हम ही हैं इसके सताये पर

सुनते खुशी उन्हें  भी  सराफत न दे सकी।४।

*

जो बन के सीढ़ी  खप  गये सत्ता के वास्ते

उनको कफन भी यार सियासत न दे सकी।५।

*

चाहे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2021 at 8:39pm — 3 Comments

किये कैद बैठा हवाओं को जो भी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२



चिढ़ा मौत से पर हँसा जिन्दगी पर

अँधेरों से डर कर  चढ़ा रौशनी पर।१।

*

किये कैद बैठा हवाओं को जो भी

बहस कर रहा है वही ताजगी पर।२।

*

बना सन्त बैठा मगर है फिसलता

कभी मेनका पर कभी उर्वशी पर।२।

*

खड़े  देवता  हैं  सभी  कठघरे में

करो चर्चा थोड़ी कभी बंदगी पर।४।

*

सभी खीझते हैं जले दीप पर तो

उठा क्रोध यारो कहाँ तीरगी पर।५।

*

अजब देवता जो डरे आदमी से

हुआ द्वंद भारी यहाँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 9, 2021 at 9:45pm — 8 Comments

पर्व गुरुओं का मनाते आज हम -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२



पर्व गुरुओं  का  मनाते आज हम

और मन के पास आते आज हम।१।

*

पुष्प भावों के  चढ़ाते आज हम 

शीष श्रद्धा से झुकाते आज हम।२।

*

है मिला हर ज्ञान उन से ही हमें

मान उनको दे जताते आज हम।३।

*

सीख उनकी आचरण में ढालकर

कर्ज किंचित यूँ चुकाते आज हम।४।

*

आब भर कर है सितारों सा किया

हर चमक उन से, बताते आज हम।५।

*

ज्ञान दाता  बढ़  बिधाता  से हैं तो

यश उन्हीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 4, 2021 at 1:35pm — 13 Comments

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