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All Blog Posts Tagged 'कविता' (984)

कविता - कौओं के पितृ स्थान

कौए अब अपने पितृ स्थान के लिए

स्कूल के बच्चों के हिस्से में आई

अनुदान राशि को हड़प ले गये ।

और अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए

राजनीति को यूँ अपनाया

कि विधायक, सरपंच मजबूर हैं

सरकारी सहायता को पितृों तक भेजने के लिए ।

अन्य पक्षियों को छोड़कर

केवल कौओं की वोटो की गिनती

के मायने जियादा हैं ।



शेर भी लाचार हैं

वे अब शिकार नहीं करते

वे शिकार हो जाते हैं ।

शेरों को हमेशा

कौओं ने सरकश में नचवाया…

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Added by सूबे सिंह सुजान on November 26, 2018 at 11:00pm — 6 Comments

उम्मीद की रोशनी (अतुकांत कविता)

चुनावी महाकुंभ के नगाडे की टंकार में

चौतरफा राजनीति का हुआ महौल गरमागरम

ईद के चांद हुए नेता जो ,

चिराग लेकर ढूंढने पर थे नदारद

योजनाओं की बरसात होने लगी

धूल उडती गड्ढे वाली सडकों पर

चुनावी सीमेंट चढ गया

उजाड बंजर खेती पर

हरियाल करने का मरहम लगाते

कंबल, साडी, दारू, मुर्गा का

बंदरबांट का फार्मूला चलाते

नित नए तरीकों से वोटरों को रिझाते

चरणवंदन कर, घडियाली ऑंसू बहाते

खोखले वायदों की दहाड,

ना खायेंगे, ना खाने देगे

दिए प्रलोभन, दिखाई…

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Added by babitagupta on November 22, 2018 at 3:19pm — 5 Comments

बदहाल जनता (तुकांत अतुकांत कविता)

प्रजातांत्रिक देश स्वतंत्र व्यक्ति

अभिव्यक्ति की आजादी

विकास यात्रा सत्तर साल की

सरकारी नक्शे पर दर्ज इलाका

हालात जस के तस

टूटे घने जंगलों में बसा वीराना सा गांव

टूटी फूटी नदी, दम तोडती पुलिया

जर्जर धूल उडाती सडकें

विकराल संकटों से जूझ रहा

जीवन से लडता

रोजीरोटी की जद्दोजहद

मैले कुचैले अर्धवदन ढके

बदहाली मे आपस में दुख बांटते

अपने गांव की पीडा समझाते

चेहरे पर पीडा झलक आती

नेताओं के झूठे वादे घडियाली ऑसू

बिना लहर के हिलोरें…

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Added by babitagupta on November 19, 2018 at 7:52pm — 7 Comments

बलातकार्य (छंदमुक्त कविता)

बलात हालात बलात नियंत्रण में हैं न!
देश-देशांतर तिजारात आमंत्रण में हैं न!
आचार-विहार, व्यवहार-व्यापार, प्रहार,
घात-प्रतिघात धार अभियंत्रण में हैं न!
**
बदले 'बदले के ख़्यालात' चलन में हैं न!
अगले-पिछले अहले-वतन फलन में हैं न!
बापू तुम्हारे ही देश में, देशभक्तों के वेश में
नोट-वोट, ओट-चोट-वोट अवकलन में हैं न!


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

टुकड़ों में बटा आदमी - डॉo विजय शंकर

टुकड़ों में बटा आदमी 

टुकड़ों की बात करता है , 

टुकड़ों को छोटे , और छोटे 

टुकड़ों…

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Added by Dr. Vijai Shanker on October 8, 2018 at 10:05pm — 18 Comments

"घटना दुखद है, घुटना ही सुखद है!" - (छंदमुक्त, अतुकान्त कविता)

तुरपाई हो नहीं सकती, भरपाई हो नहीं सकती

कपड़े फट सकते हैं, चिथड़े उड़ सकते हैं

सुनवाई होती है, कार्यवाही सदैव हो नहीं सकती

घटना दुखद है, अफ़सोस, घुटना ही सुखद है!



मुुुलाक़ात, मीडियापा, राजनीति, बदज़ुबानी हो सकती है,

अपहरण, लिंचिंग, जुतयाई, जगहंसाई हो सकती है,

निवारण, निराकरण तो क्या एफआईआर ही हो नहीं सकती,

घटना दुखद है, अफ़सोस, घुटना ही सुखद है!



टूटना-फूटना, लुटना-लूटना, रोना-रुलाना, चीखना-चिल्लाना,

सब फ़िल्मी शूटिंग सी अदायगी हो सकती है,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 30, 2018 at 10:00am — 4 Comments

दोस्ती [तुकांत - अतुकांत कविता]

बचपन की यादों का अटूट बंधन 

बिना लेनदेन के चलने वाला 

खूबसूरत रिश्तों का अद्वितीय बंधन 

एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी में 

नई-नई सोच से रूबरू करवाया 

अर्थहीन जीवन को अर्थ पूर्ण बनाया 

जीने का एक…

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Added by babitagupta on August 27, 2018 at 8:00pm — 4 Comments

टकराव — डॉo विजय शंकर

फिर एक बार 

स्वाधीनता का 

जश्न मनाया हमने। 

पर अभी भी स्वाधीनता 

का…

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Added by Dr. Vijai Shanker on August 15, 2018 at 9:59am — 8 Comments

'आदी की चादर' (छंदमुक्त, अतुकांत कविता)

मां, गुजराती चादर दे दे!

मैं 'फ़ादर' सा बन जाऊं!

जनता अपने राष्ट्र की

स्वामियों, बापुओं सा आदर दे दे!

अंग्रेज़ों सा व्यापारी बन कर,

तोड़ूं-फोड़ूं और मारूं-काटूं

विदेशी सूट पहन इतराऊं!

मां किसी 'गांधी' सी 'चादर' ओढ़ाकर

तस्वीरें, मूर्तियाँ मेरी सजवादे

मैं भी जिंदा लीजेंड, किंवदंती कहलाऊं!

मुग़ल, अंग्रेज़, हिटलर, कट्टर

सब से शिक्षायें ले लेकर

आतंक कर आतंकी न कहलाऊं !

मां 'धर्म' की बरसाती दे दे

बदनामियों सा न भीग जाऊं!

मां…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2018 at 6:38am — 7 Comments

मार्केटिंग - डॉo विजय शंकर

प्रचार हो रहा है ,
प्रचार चल रहा है ,
दुष्प्रचार दौड़ रहा है ,
अपनी ढपली ,
अपना राग बज रहा है ,
स्वप्रचार ,
स्वयं का उपहास बन रहा है ,
दूसरे का दुष्प्रचार ,
न हास्य है , न व्यंग है ,
स्वयं आपके व्यक्तित्व से
चिपटता जा रहा है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 7, 2018 at 7:59pm — 11 Comments

ये क्या देखता हूँ

किसी बुरी शै का असर देखता हूं ।

जिधर देखता हूं जहर देखता हूं ।।

रोशनी तो खो गई अंधेरों में जाकर।

अंधेरा ही शामो शहर देखता हूं ।।

किसी को किसी की खबर ही नहीं है।

जिसे देखता हूं बेखबर देखता हूं ।।

ये मुर्दा से जिस्म जिंदगी ढो रहे हैं।

हर तरफ ही ऐसा मंजर देखता हूं ।।

लापता है मंजिल मगर चल रहे हैं।

एक ऐसा अनोखा सफर देखता हूँ।।

चिताएं चली हैं खुद रही हैं कब्रें।

मरघट में बदलते घर देखता हूं ।।

परेशां हूं दर्पण ये क्या देखता…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on August 1, 2018 at 9:56pm — 4 Comments

मैं और मेरे गुरु [कविता]

क्षण-प्रतिक्षण,जिंदगी सीखने का नाम  

सबक जरूरी नहीं,गुरु ही सिखाए

जिससे शिक्षा मिले वही गुरु कहलाये 

जीवंत पर्यन्त गुरुओं से रहता सरोकार 

हमेशा करना चाहिए जिनका आदर-सत्कार 

प्रथम पाठशाला की गुरु माँ बनी …

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Added by babitagupta on July 27, 2018 at 1:00pm — 2 Comments

एक ज़िद (कविता)

बहुत देख ली आडंबरी दुनिया के झरोखों से 

बहुत उकेर लिए मुझे कहानी क़िस्सागो में 

लद गए वो दिन, कैद थी परम्पराओं के पिंजरे में 

भटकती थी अपने आपको तलाशने में  

उलझती थी,  अपने सवालों के जबाव ढूँढने में 

तमन्ना थी बंद मुट्ठी के सपनों को पूरा करने की 

उतावली,आतुर हकीकत की दुनिया जीने की 

दासता की जंजीरों को तोड़

,लालायित हूँ मुक्त आकाश में उड़ने को 

 लेकिन अब उठ गए इन्क्लाबी कदम 

बेखौफ हूँ,कोइ…

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Added by babitagupta on July 26, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

'अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय (अतुकांत कविता)

सबको तो

डस रहे हैं, फंस रहे हैं

असरदार या बेअसर?

नकली या असली?

देशी, विदेशी या एनआरआई?

मुंह में सांप

हाथों में सांप

बदन में सांप

गले पड़े सांप

सिर पर सांप

सांपों के तालाबों से!

मानव समाज में

शब्दों, जुमलों, नारों,

फैशन, गहने या हथियार रूपेण!

या प्रतिशोध लक्षित

मानव-बम सम!

पर कितना असर

जनता पर, सरकार पर?

केवल घायल लोकतंत्र

सपेरों के मंत्र

यंत्र, इंटरनेट

और सोशल मीडिया!

पनीले या…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 22, 2018 at 12:00pm — 2 Comments

खोयी कहानी

कई दिनों से तलाश रहा हूँ

एक भूली हुई डायरी

कुछ कहानियाँ

जो स्मृतियों में धुंधली हो गई हैं |

कई सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद

मुड़ कर देखता हूँ

कदमों के निशान

जो ढूढें से भी नहीं मिलते हैं |

कामयाबी के बाद बाँटना चाहता हूँ

हताशा और निराशा

के वो किस्से

जो रहे हैं मेरी जिंदगी के हिस्से |

पर उसे सुनने का वक्त

किसी पे नहीं है

और ये सही है की

नाकामयाबी सिर्फ अपने हिस्से की चीज़ है…

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Added by somesh kumar on July 17, 2018 at 8:30am — 1 Comment

पेड़ तले पौधा

जिंदगी यूँ तो लौट आएगी

पटरी पर

पर याद आएगा सफ़र का

हर मोड़

कुछ गडमड सड़कों के

हिचकोले

कुछ सपाट रस्तों पर बेवजह

फिसलना

और वक्त-बेवक्त तेरा

साथ होना |

याद आएगा  एक पेड़

घना  छाँवदार  

जिसके आसरे एक पौधा

पेड़ बना |

मौसमों की हर तीक्ष्णता का

सह वार  

पौधे को सदा दिया

ओट प्यार  |

निश्चय ही मौसम बदलने से

होगा कुछ अंकुरित  

पर वो रसाल है मेरी जड़ो…

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Added by somesh kumar on July 16, 2018 at 10:30am — 6 Comments

सदा बिखरी रहे ये हंसी..

हँसमुखी चेहरे पर ये कोलगेट की मुस्कान,

बिखरी रहे ये हँसी,दमकता रहे हमेशा चेहरा,

दामन तेरा खुशियों से भरा रहे,

सपनों की दुनियां आबाद बनी रहे,

हँसती हुई आँखें कभी नम न पड़े,

कालजयी जमाना कभी आँख मिचौली न खेले,…

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Added by babitagupta on July 8, 2018 at 5:00pm — 9 Comments

दिल का साँचा

नींद आँखों से खफा –खफा है /

चली है ठंडी हवा वो याद आ रह है /

लिखा था मौसम किसी कागज़ पे/

टहलती आँख लफ्ज़ फड़फड़ा रहा है /

सिलवटें बिस्तरों पे नहीं सलामत /

दिल का साँचा हुबहू बचा हुआ है/

नक्ल करके नाम तो पा सकता हूँ /

पर मेरा वजूद इसमें क्या है?

वो आज भी रहता है मेरे आसपास /

मेरे बच्चे में मुस्कुरा रहा है |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित…

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Added by somesh kumar on July 5, 2018 at 7:24am — 5 Comments

वरखा बहार आई........[तुकांत-अतुकांत कविता]

घुमड़-घुमड़ बदरा छाये,

चम-चम चमकी बिजुरियां,छाई घनघोर काली घटाएं,

घरड-घरड मेघा बरसे,

लगी सावन की झड़ी,करती स्वागत सरसराती हवाएं........

लो,सुनो भई,बरखा बहार आई......

तपती धरती हुई लबालव,

माटी की सौंधी खुश्बू,प्रफुल्लित बसुन्धरा से संदेश कहती,

संगीत छेड़ती बूंदों की टप-टप ,

लहराते तरू,चहचहाते विहग,कोयल मधुर गान छेड़ती.......

लो सुनो भई,वरखा बहार आई.......

छटा बिखर गई,मयूर थिरक उठा-सा,

सुनने मिली झींगरों की झुनझुनी,पपीहे…

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Added by babitagupta on June 28, 2018 at 8:30pm — 9 Comments

कवि (अतुकान्त कविता)

संवेदनाओं की पथरीली चोटी पर बैठकर

अपने रिसते हुए घावों को देखता हुआ

ये कौन है

जो कभी कुत्ते की तरह

जीभ से उन्हें चाटता है

तो कभी मुट्ठी में नमक भर कर

उनमें उड़ेल देता है

और फिर एक तपस्वी की तरह

ध्यान लगाकर सुनता है

अपनी आहों और कराहों को?

पत्थरों को उठा कर

अपने लहू में डुबा कर

भावनाओं की लहरों पर बैठे हुए

कौन लिख रहा है उनसे

अपना मृत्यु लेख?

किसी फन्दे पर लटक कर

एक पल में शान्ति से गुज़र जाने की अपेक्षा…

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Added by Mahendra Kumar on June 27, 2018 at 9:03am — 4 Comments

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