For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Vijay nikore's Blog (212)

धारा-गति

बर्फ़ीला मौन रिश्ते की आत्मा के फूलों पर

झुठलाती-झूठी अजनबी हुई अब बातें

स्नेह के सुनहरे पलों में हाथों में वेणी लिए

शायद बिना सोचे-समझे कह देते थे तुम ...

" फूलों-सी हँसती रहो, कोयल-सी गाती रहो "

" अब आज से तुम मेरी ज़िम्मेवारी हो "

और मैं झुका हुआ मस्तक लिए

श्रधानत, कुछ शरमाई, मुस्करा देती थी

कोई बातें कितनी जल्दी

इ..त..नी  पुरानी हो जाती हैं

जैसे मैं और हम और हमारी

आपस में घुली एकाकार साँसें…

Continue

Added by vijay nikore on January 7, 2017 at 5:22pm — 9 Comments

अमोल आभाएँ

तुम्हारे स्नेह की रंगीन रश्मि

मैं उद्दीप्त

गंभीर-तन्मय ध्यानमग्न

कहीं ऊँचा खड़ा था

और तुम

मुझसे भी ऊँची ...

वह कहकहे

प्रदीप्त स्फुलिंगों-से

हमारी वार्ताएँ मीठी

चमकती दमकती

आँखों में रोशनी की लहर-सी

तुम्हारी बेकाबू दुरंत आसमानी मजबूरी

बरसों पहले की बात

अचानक चाँटे-सी पड़ी

ताज़ी है आज भी

गुंथी तुमसे

उतनी ही मुझसे

बिंध-बिंध जाती है

वेदना की छाती को…

Continue

Added by vijay nikore on January 2, 2017 at 8:40pm — 22 Comments

डबडबाई आँखें

कभी हँसते कभी रोते समय की कानों में आहट

अरमानों की उतरती-चढ़ती लम्बी परछाइयाँ

आकारहीन अँधेरे में अंधों की तरह

अभी भी हम एक-दूसरे को खोजते हैं

इस खोज में तेरे आँसुओं ने मुझको

बहुत दिया

इतना दिया कि मुझसे आज तक 

झेला नहीं गया

काँपती परछाइयों में तुम आई, हर बार

मन का पलस्तर उखड़ गया

स्वर तुम्हारे, कभी स्वर मेरे रुंधे हुए

खोखले हुए

तुमको, कभी मुझको सुनाई न दिए

पर सुन लेती हैं…

Continue

Added by vijay nikore on November 15, 2016 at 3:08pm — 10 Comments

दर्दीली पहचान

असंतोष की छटपटाहटें समेटते

गहन वेदना की छायाओं में पले

टूटे विश्वास के घाव खुले-के-खुले

न सिले

सिले ओंठ उन घावों की आस्था की

तकलीफ़ भरी पुकार के

मिट्टी के ढेले के उड़ गए कण हों मानो

उन घावों के मैदान से तुम तक अब

कोई आवाज़ तक नहीं आती

आदि से अनन्त हुए

सनातन संघर्षी घावों की आयु है कब से

तुम्हारे संवेदनशील भावों से अनजान

घायल दिन का अस्थि-पंजर समेटे

एक और न गुज़रती रात की अकथनीय पीड़ा…

Continue

Added by vijay nikore on October 31, 2016 at 3:00pm — 6 Comments

मकबरा

भीतर पुराने धूल-सने मकबरे में

धुआँते, भूलभुलियों-से कमरे

अनुभूत भीषण एकान्त

विद्रोही भाव

जब सूझ नहीं कुछ पड़ता है

कुछ है जो घूमघाम कर बार-बार

नव-आविष्कृत बहाने लिए

अमुक स्थिति को ठेल…

Continue

Added by vijay nikore on October 19, 2016 at 11:00pm — 14 Comments

तीन क्षणिकाएँ

क्षणिका .. १

सूखी पीली झाड़ी सरीखा बाँझ रिश्ता

अँधियाले भरी सांझ में मानो कोई घायल पक्षी

वेदनाओं की नीली गुत्थियाँ खोले

 

क्षणिका .. २

कुम्हलाए साँवले रिश्ते के उदास बगीचे में

सुनता हूँ, "स्नेह अभी भी है"

पर अनस्तित्व को अस्तित्व देती

उस स्नेह में अब मीठी चाशनी नहीं है

क्षणिका .. ३

गहरे अकेले प्रश्नों से बिम्बित

पुराना वेदनामय अस्तित्व ...

बहती है अभी भी रुधिर…

Continue

Added by vijay nikore on August 22, 2016 at 5:00pm — 6 Comments

हृदय-दान

मेरा बीसवीं सदी का पुरातन स्नेह

यह इक्कीसवीं सदी के तुम्हारे

कभी न बदलने के वायदे

स्नेह की किरणों के पुल पर 

एक संग उठते-गिरते-चलते

यह संवेदनशील हृदय कभी

तुम्हारा संबल बना था

चाँदनी-सलिल-सा तरल स्नेह

जीवन-यथार्थ का पिघला हुआ कुंदन ...

कहती थी

इसकी अमोल रत्न-सी आभा

थी तुम्हारी रातों में तेजोमय प्रेरणा

या असंतोष की धूप की छटपटाहटों में

ज्यों लहराई सनातन सत्यों की…

Continue

Added by vijay nikore on July 10, 2016 at 3:59pm — 8 Comments

विदा काल

कोई कल्पना-स्वप्न ही होगा शायद

हुआ जो हुआ, वह इरादतन नहीं था

नियति की काल-कोठरी को बूझा है कौन

‘ कहाँ- कहाँ था मेरा दोष ’ का गंभीर भान

दोष कहीं कोई तुम्हारा नहीं था

जीवन के आरोह-अवरोह से डरी-डरी

अज्ञात भय से भीगी तुम कह देती थी ...

अनहोनी का होना कोई नया नहीं है

और मैं, गई रात की हिमीभूत टीस छिपाये

हलके-से दबाकर हाथ तुम्हारा

मुस्करा देता था

उस गंभीर पल को छल देता था

अनगिन…

Continue

Added by vijay nikore on July 8, 2016 at 5:43pm — 12 Comments

गंगा में बह रहे हैं फूल

आज तुम असमंजस में क्यूँ हो

देखकर गंगा में बहते फूलों को

जब तुम ही नहीं हो अब सुनने को

अब अपाहिज हुए अनुभूत तथ्यों को

अंधेरे बंद कमरे में कल रात

बड़ी देर तक ठहर गई थी रात

अकुलाती, दर्द भरी, रतजगी

आस्था रह न गई

ख़्यालों के अनबूझे ब्रह्माण्ड में

छटपटाती छिपी हुई कोई गहरी पहचान

भोर से पहले रात की अंतिम-दम चीखें

अन्धकार भरे अम्बर में जीवन्त पीड़ा

ऐसे में हमारे निजी अनुभूत तथ्यों ने

लिख कर…

Continue

Added by vijay nikore on June 15, 2016 at 1:55am — 18 Comments

वक्तव्य ... काव्य-यात्रा और जीवन-यात्रा में समन्वय

दर्द मेरी कविता में नहीं है ... दर्द मेरी कविता है।

दर्द के भाव में बहाव है, केवल बहाव, .. कोई तट नहीं है, कोई हाशिया नहीं है जो उसकी रुकावट बने।

 

पत्तों से बारिश की बूँदों को टपकते देख यह आलेख कुछ वैसे ही अचानक जन्मा जैसे मेरी प्रत्येक कविता का जन्म अचानक हुआ है। कोई खयाल, कोई भाव, कोई दर्द दिल को दहला देता है, और भीतर कहीं गहरे में कविता की पंक्तियाँ उतर आती हैं।

 

दर्द एक नहीं होता, और प्राय: अकेला नहीं आता। समय-असमय हम नए, “और” नए, दर्द झोली…

Continue

Added by vijay nikore on June 9, 2016 at 9:49am — 3 Comments

पुण्य-तिथि .... (विजय निकोर)

पुण्य-तिथि

(२७ वर्ष उपरान्त भी लगता है ... माँ अभी गई हैं, अभी लौट आएँगी)

माँ ...

रा्तों में उलझे ख्यालों के भंवर में, या

रंगीले रहस्यमय रेखाचित्रों की ओट में

कभी चुप-सी चाँदनी की किरणों में

श्रद्धा के द्वार पर धुली आकृतिओं में

सरल निडर असीम आत्मीय आकृति

माँ की खिलखिलाती मुसकाती छवि

समृतिओं के दरख़तों की सुकुमार छायाएँ

स्नेह की धूप का उष्मापूरित चुम्बन

मेरे कंधे पर तुम्हारा स्नेहिल हाथ…

Continue

Added by vijay nikore on May 8, 2016 at 1:30pm — 31 Comments

चिन्तामग्न

चिन्तामग्न

 

तुमसे मिलने पर

और तुमसे न मिलने पर भी

काँपते हुए, डरे हुए

पिघलते हुए प्रश्न

 

व्यथाओं की उलझन के अंतर्वर्ती विस्तार में

दर्दीली रातों में द्वंद्व की आड़ी-टेड़ी…

Continue

Added by vijay nikore on April 25, 2016 at 1:30pm — 6 Comments

शून्याकृति

शून्याकृति

 

अकेलापन…

Continue

Added by vijay nikore on April 3, 2016 at 8:00pm — 12 Comments

पूरा अधूरा वायदा

पूरा अधूरा वायदा

शब्दों के अभाव में कहे-अनकहे के

कढ़वे अन्तराल में

पार्क में पत्थर के बैंच को साक्षी बना

आसान था कितना

हम दोनों का अलविदा के समय कह देना ...

" हो सके तो भूल जाना  तुम  मुझको "

" तुम  भी ..."

उस शाम के मेघों की वाणी में कुछ था, कुछ कहा

अत: वायदा वह पूरा हो न सका, न तुमसे, न मुझसे

रुँधी हुई ज़िन्दगी में भुलाने के असफ़ल प्रयास में

स्मृतिओं  के धुँआते खंडहर के…

Continue

Added by vijay nikore on March 13, 2016 at 6:35am — No Comments

दर्द भरी गहरी पुकार

दर्द भरी गहरी पुकार

हमारा रिश्ता

एक ढहा हुआ मकान ...

तुम बदले

तुम्हारे इमान बदले

मेरे सवाल, और

तुम्हारे उन सवालों के जवाब बदले

सुना है

इमान का अपना

अनोखा चेहरा होता है

सूर्य की किरणों-सा अरुणित

बर्फ़ीली दिशाओं को पिघलाता

आसमान को भी पास ले आता है

उसी अरुणता को

अपने  "आसमान "  को  

तुम्हारे इमान को 

मैं तुम्हारी आँखों में देखती…

Continue

Added by vijay nikore on January 31, 2016 at 7:11am — 12 Comments

पिघली हुई आँच

पिघली हुई आँच

कुछ ऐसी ही 

पीली उदासीन संध्याएँ

पहले भी आई तो थीं

पर वह जलती हुई भाफ लिए

इतनी कष्टमयी तो न थीं

दिल से जुड़े, चंगुल में फंसे हुए

द्व्न्द्व्शील असंगत फ़ैसलों पर तब

"हाँ" या "न" की कोई पाबंदी न थी

"जीने" या "न जीने" का

साँसों में हर दम कोई सवाल न था

अनवस्थ अनन्त अकेलापन

तब भी चला आता था

पर वह दिल के किसी कोने में दानव-सा

प्रतिपल बसा नहीं रहता…

Continue

Added by vijay nikore on December 21, 2015 at 3:58am — 8 Comments

सलवटें

कहने को दोस्त हैं बहुत

लेकिन दोस्त,

सच में 

तुम ही  "एक"  दोस्त थी मेरी

अपरिभाषित दिशाओं के पट खोल

सुविकसित कल्पनाओं को बहती हवाओं में घोल

मुझको अँधियाले ताल के तल से

प्रसन्नता की नभचुम्बी चोटी पर ले गई थी

वह तुम ही तो थी

हर हाल में मुझको

लगती थी अपनी

इतनी

कि मैं पैरों के घिसे हुए तलवों को

मन की फटी हुई चादर की सलवटों को

दिखाने में संकोच नहीं करता था...

सवाल ही नहीं उठता…

Continue

Added by vijay nikore on December 13, 2015 at 9:17am — 12 Comments

आरोह-अवरोह

आरोह-अवरोह

कभी-कभी ... कभी कभी

आत्म-चेतन अंधेरे में ख़यालों के जंगल में

रुँधे हुए, सिमटे हुए, डरे-डरे

चुन रहा हूँ मानो अंतिम संस्कार के बाद

झुठलाती-झूठी ज़िन्दगी के फूल

और सौ-सौ प्रहरी-से खड़े  आशंका के शूल

दो टूक हुई आस्था की काँट-छाँट

अच्छे-बुरे तजुर्बे बेपहचाने

पावन संकल्प, पुण्य और पाप

पानी और तेल और राख

कितना कठिन है प्रथक करना

सही और गलत के तर्क से ओझल हो कर

कठिन है…

Continue

Added by vijay nikore on August 17, 2015 at 3:30pm — 12 Comments

परिणति पीड़ा

परिणति पीड़ा

रिश्ते के हर कदम पर, हर चौराहे पर

हर पल

भटकते कदम पर भी

मेरे उस पल की सच्चाई थी तुम

जिस-जिस पल  वहीं कहीं पास थी तुम

जीवन-यथार्थ की कठिन सच्चाइयों के बीच भी

खुश था बहुत, बहुत खुश था मैं

पर अजीब थी ज़िन्दगी वह तुम्हारे संग

स्नेह की ममतामयी छाओं के पीछे भी मुझमें

था कोई अमंगल भ्रम

भीतरी परतों की सतहों में हो जैसे

अन-चुकाये कर्ज़ का कंधों पर भार

तुमसे कह न सका पर इतनी…

Continue

Added by vijay nikore on August 16, 2015 at 5:30pm — 30 Comments

नीरवताएँ

नीरवताएँ

दुखपूर्ण भावों से भीतर छिन्न-भिन्न

साँस-साँस में लिए कोई दर्दीली उलझन

मेरे प्राण-रत्न, प्रेरणा के स्रोत

तुम कुछ कहो न कहो पर जानती हूँ मैं

किसी रहस्यमय हादसे से दिल में तुम्हारे

है अखंडित वेदना भीषण

चोट गहरी है

दुख का पहाड़ है

दुख में तुम्हारे .. तुम्हारे लिए

दुख मुझको भी है

रंज है मुझको कि संवेदन-प्रेरित भी

मैं कुछ कर नहीं पाती

खुले रिसते घाव को तुम्हारे 

सी नहीं…

Continue

Added by vijay nikore on July 15, 2015 at 3:30am — 14 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Sunday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Saturday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  आदरणीय,  तकनीकी दृष्टिकोण से मैं कुछ  अधिक नहीं कह सकता । किन्तु यदि हमारा …"
Jun 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी विद्वद्जन अपने-अपने हिसाब कुछ न कुछ चर्चा कर रहे हैं, उपाय बता रहे हैं, आदरणीय ..  आप भी…"
Jun 12
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" आदरणीय सौरभ साहब,  अंततोगत्वा कुछ ऐसा प्रबंध तो होना ही चाहिए कि ओ,बी,ओ पराभव को प्राप्त…"
Jun 12
जगदानन्द झा 'मनु' added a discussion to the group मैथिली साहित्य
Thumbnail

भक्ति गजल

सजल कन्हाइ रूपक रस बहाबैएहरिक ई रूप दुनियाकेँ रिझाबैएमुकुटपर पैंख मोरक मोहनी सोहैहियामे रस सिनेहक ई…See More
Jun 11

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  उत्साहित बने रहने और सतत चलते रहने के सुझाव से निस्सृत होती सकारात्मकता का आयाम आश्वस्तिकारी…"
Jun 8
धर्मेन्द्र कुमार सिंह replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जब कविता कोश चल सकता है तो ओबीओ क्यूँ नहीं। वहाँ भी शुरू में जो लोग थे आज नहीं हैं। नए-नए लोग…"
Jun 6

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service