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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s Blog (137)

रस्सा-कशी खेल था जीवन(५८ )

एक विरह गीत

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रस्सा-कशी खेल था जीवन

एक तरफ का रस्सा छोड़ा |

इतनी भी क्या जल्दी थी जो

मीत अचानक नाता तोड़ा |

**

जीवन नदिया अपनी धुन में

अठखेली करती बहती थी |

और खुशी भी इस आँगन में

अपनी मर्जी से रहती थी |

सब कुछ अपने काबू में था

कैसे रहना क्या करना है,

हाँ थोड़े से दुख के झटके

कभी ज़िंदगी भी सहती थी |

लेकिन तुम थे साथ हमेशा

हँस हँस कर सह ली हर…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 25, 2019 at 1:30pm — 6 Comments

क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? (५७)

एक गीत प्रीत का 

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क्यों चिंता की लहरें मुख पर आखिर क्या है बात प्रिये ? 

पलकों के कोरों पर ठहरी क्यों कर है बरसात प्रिये ?

**

शुष्क अधर क्यों बाल बिखर कर अलसाये हैं शानों पर ?

काजल क्रोधित होकर पिघला जा पहुँचा है कानों पर | 

मीत कपोलों पर जो रहती वह गायब है अरुणाई | 

ऐसा लगता है ज्यों खो दी चंद पलों में तरुणाई…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 20, 2019 at 9:00am — 4 Comments

किसी के प्यार की ख़ातिर हमारा दिल तरसे (५६ )

किसी के प्यार की ख़ातिर हमारा दिल तरसे

घटा-ए-इश्क़ तो छाई न जाने कब बरसे

**

न तीर दिल पे चला यार ज़ख़्म गर देना

कि इस पे ज़ख़्म हुआ करते जब गुल-ए-तर से

**

क़दम बढ़ाना भी मुश्किल है जानिब-ए-मंज़िल

मिला फ़रेब हमें इस क़दर है रहबर से

**

करेगा चूर अगर ज़ुल्म की हदें टूटें

उमीद और है क्या आईने को पत्थर से

**

ख़ुदाया देख ज़रा भी किसी को, दर्द नहीं

किसी के दर्द बड़े हो गए समंदर से

**

लकीरें हाथों की जिसने बनाई मेहनत से

उसे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 18, 2019 at 1:00am — 2 Comments

मिटाने फासले तुझको अगर है गुफ़्तगू कर ले (५५ )



मिटाने फासले तुझको अगर हैं  गुफ़्तगू कर ले 

सियेगा ज़ख्म कोई सोच मत ख़ुद ही रफ़ू कर ले 

**

मुक़ाबिल ख़ौफ़-ए-ग़म होजा अगर पीछा छुड़ाना है

ग़मों से भाग मत इक बार तू रुख़ रूबरू कर ले 

**

नहीं महफ़ूज़ गुलशन में कली कच्ची अभी तक भी 

बचा है कौन अब उसकी जो फ़िक्र-ए-आबरू कर ले 

**

कोई तो दर्द है दिल में लबों पर आ नहीं पाता …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 26, 2019 at 5:30pm — 2 Comments

बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे (५४)

बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे 

मंज़िल कैसे ढूंढोगे जब रहबर ही गुमराह करे 

**

आज हुआ है इंसानों में प्यार मुहब्बत क्यों ग़ायब 

घर घर की चर्चा है अपने अपनों से ही डाह करे 

**

पानी मांग नहीं पाता है साँपों का काटा जैसे 

ऐसा काम भयानक अक़्सर मज़्लूमों की आह करे 

**

आज अक़ीदत और इबादत का जज़्बा गुम सा देखा 

दिल में जब…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 22, 2019 at 8:00pm — 2 Comments

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |  (५३ )

एक गीत प्रीत का

===========

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो |

**

लता के सम लिपट जाना , नखों से पीठ खुजलाना |

अधर से चूम लेना मुख,नयन से कुछ कहा जाना |

कभी पहना दिया हमदम,गले में हार बाहों का

अचानक गोद में लेकर,तुम्हारा केश सहलाना |

हथेली से छुपा लेना, तुम्हारा नैन को मेरे

इशारे प्यार के थे या, शरारत भेद यह खोलो |

"मुहब्बत की नहीं मुझसे " , प्रिये ! तुम झूठ मत बोलो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 20, 2019 at 4:00pm — 8 Comments

ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी (५२)

(११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ )

.

ये हुआ है कैसा जहाँ खुदा यहाँ पुरख़तर हुई ज़िंदगी

न किसी को ग़ैर पे है यक़ीं न मुक़ीम अब है यहाँ ख़ुशी

**

कहीं रंज़िशें कहीं साज़िशें कहीं बंदिशें कहीं गर्दिशें

कहाँ जा रहा है बता ख़ुदा ये नए ज़माने का आदमी

**

कहीं तल्ख़ियों का शिकार है कहीं मुफ़्लिसी की वो मार है

मुझे शक है अब ये बशर कभी हो  रहेगा ज़ीस्त में शाद भी

**

कहीं वहशतों का निज़ाम है कहीं दहशतें खुले-आम हैं 

मिले आदमी से यूँ आदमी मिले अजनबी से जूँ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 30, 2019 at 2:30am — 1 Comment

ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए(५१)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

ग़म को क़रीब से मियाँ देखा है इसलिए

अपना ही दर्द ग़ैर का लगता है इसलिए'

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जब और कोई राह न सूझे ग़रीब को

रस्ता हुज़ूर ज़ुर्म का चुनता है इसलिए

**

बाज़ार के उसूल हुए लागू इश्क़ पर

बिकता है ख़ूब इन दिनों सस्ता है इसलिए

**

आसाँ न दरकिनार उसे करना ज़ीस्त से

दिल का हुज़ूर आपके टुकड़ा है इसलिए

**

उनके ज़मीर के हुए चर्चे जहान में

मिट्टी के भाव में…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 28, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़(५० )



सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़

अगर पैहम है तकलीफ़-ए-अवाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

निज़ामत देखती रहती वतन में क़त्ल-ओ-गारत क्यों

नज़रअंदाज़ की खू-ए-निज़ाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

न रोके तिफ़्ल की परवाज़ कोई भी ज़माने में

कभी सपने के घोड़े पर लगाम अच्छी नहीं हरगिज़

**

किसी को हक़ नहीं है ये कि ले क़ानून हाथों में

मगर सूरत वतन में है ये आम अच्छी नहीं हरगिज़

**

क़ज़ा को घर बुलाना है तुम्हें तो ख़ूब पी लेना

वगरना मय है पक्की या है ख़ाम अच्छी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 27, 2019 at 9:15pm — 5 Comments

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी (४९)

हाय क्या हयात में दिखाए रंग प्यार भी

इस चमन में साथ साथ फूल भी हैं ख़ार भी

**

देखते बदलते रंग मौसमों के इश्क़ में

हिज्र की ख़िज़ाँ कभी विसाल की बहार भी

**

इंतज़ार की घड़ी नसीब ही नहीं जिसे

क्या पता उसे है चीज़ लुत्फ़-ए-इंतिज़ार भी

**

कीजिये सुकून चैन की न बात इश्क़ में

इश्क़ में क़रार भी है इश्क़ बे-क़रार भी

**

चश्म इश्क़ में ज़ुबान का हुआ करे बदल

जो शरर बने कभी कभी है आबशार भी

**

प्यार एक फ़लसफ़ा है और नैमत-ए-ख़ुदा

रंज़ है इसे बनाते लोग…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 24, 2019 at 1:30pm — 4 Comments

मन के आँगन में फूटा जो प्रीतांकुर नवजात |(४८ )

एक गीत

==========

मन के आँगन में फूटा जो

प्रीतांकुर नवजात |

खाद भरोसे की देकर अब

सींच इसे दिन-रात |

**

ध्यान रहे यह इस जीवन का

बीत गया बचपन |

आतुर है दस्तक देने को

अब मादक यौवन |

उर-आँगन में जगमग हर पल

सपनों के दीपक

और रही झकझोर हृदय को

यह बढ़ती धड़कन |

वयः संधि का काल हृदय में

भावों का उत्पात |

खाद भरोसे की देकर अब

सींच इसे दिन-रात…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 23, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै (४७ )

ताज़ा गर दिल टूटा है तो वक़्त ज़रा दीजै 

क़ायम रखना रिश्ता है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

सिर्फ़ शनासाई से होता प्यार कहाँ मुमकिन 

इश्क़ मुक़म्मल करना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

पहले के दिल के ज़ख़्मों का भरना है बाक़ी 

ज़ख़्म नया गर देना है तो वक़्त ज़रा दीजै 

**

ख़्वाब कभी क्या बुनने से ही होता है कामिल 

पूरा करना सपना है तो वक़्त ज़रा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 13, 2019 at 1:30am — 2 Comments

किस तरह होते फ़ना प्यार निभाने के लिए (४६ )

कैसे होते हैं  फ़ना प्यार निभाने के लिए 

छोड़ जाऊंगा नज़ीर ऐसी ज़माने के लिए 

**

रूह का हुस्न जिसे दिखता वही आशिक़ है 

जिस्म का हुस्न तो होता है लुभाने के लिए 

**

दरमियाँ गाँठ दिलों के जो पड़ी कब सुलझी 

कौन दीवार उठाता है गिराने के लिए 

**

अच्छे लोगों की कमी रहती है क्या जन्नत में 

क्यों ख़ुदा उनको है तैयार बुलाने…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 8, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है (४५ )

(१२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ १२२ )

.

वफ़ा ढूंढते हो जफ़ा के नगर में यहाँ पर वफ़ा अब बची ही कहाँ है 

बुझी है वफ़ा की मशालें दिलों से वफ़ा का नहीं कोई नाम-ओ-निशाँ है 

**

यहाँ राज करते हवस के पुजारी किसी की नहीं है मुहब्बत से यारी 

इधर बेवफ़ाओं का लगता है मेला कोई बावफ़ा अब न मिलता यहाँ है 

**

इधर पैसा फेंको दिखेगा तमाशा अगर जेब ख़ाली मिलेगी हताशा 

इधर है न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 31, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?(४४)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

.

रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?

बेसबब साहिल-ए-मिज़गाँ पे नमी होती क्या ?

**

ज़ख़्म ख़ुद साफ़ करें और लगाएं मरहम

ज़ख़्म क़ुदरत किसी के ज़िंदगी में धोती क्या ?

**

चन्द लोगों के नसीबों में लिखी है ग़ुरबत

ज़ीस्त सबकी ग़मों का बोझ कभी ढोती क्या ?

**

बाग़बाँ फ़र्ज़ निभाता जो तू मुस्तैदी से

तो कली बाग़ की अस्मत को कभी खोती क्या ?

**

क्यों किनारे पे कई बार सफ़ीने डूबे

इस तरह रब कभी क़िस्मत किसी की…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 28, 2019 at 12:30am — 4 Comments

कितना अफ़्कार में मश्ग़ूल हर इक इन्साँ है(४३ )

कितना अफ़्कार में मश्ग़ूल हर इक इन्साँ है 

कोई बेफ़िक्र अगर है तो सियासतदाँ है 

**

ख़ाक उड़ती है जिधर देखूँ उधर सहरा-सी 

इस क़दर दिल का नगर आज मेरा वीराँ है 

**

बात गुस्से में कही फिर से ज़रा ग़ौर तो कर 

"जी ले तू प्यार के बिन " कहना बहुत आसाँ है 

**

कोई अफ़सोस नहीं गर मेरी रुसवाई का 

शर्म से क्यों हुई ख़म यार तेरी मिज़गाँ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 26, 2019 at 9:30pm — 2 Comments

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )

(१२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२ )

.

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है 

उक़ूल पर ज्यों पड़े हैं ताले अदब का ख़ुर्शीद ढल रहा है 

**

किसी की माँ का नहीं है रिश्ता किसी भी दल से मगर यहाँ पर

ये पाक रिश्ता भरी सभा में बिना सबब ही उछल रहा है

**

किसी ने की याद सात पुश्तें किसी को कह डाले चोर कोई

जुबान बस में नहीं किसी की जुबाँ का लहज़ा बदल रहा है …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 13, 2019 at 1:00am — 3 Comments

मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही (४१)



मौज ख़ुद आपको साहिल पे लगाने से रही 

और क़ुदरत भी कोई जादू दिखाने से रही 

***

हौसला आपका दे साथ करम हो रब का 

फिर किसी सिम्त बला कोई सताने से रही 

***

हो सके जितना हक़ीक़त ये समझ लो सारे 

मौत मर्ज़ी से कभी आपकी आने से रही 

***

इम्तिहाँ रोज़ ही देने हैं यहाँ जीने को 

रोने धोने से तरस ज़िंदगी खाने से रही 

***

हो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं  (४०)

(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )

.

मिलती अवाम को ख़ुशी की जलपरी नहीं 

रुख़्सत अगर वतन से हुई भुखमरी नहीं 

**

उल्फ़त जनाब होती नहीं है रियाज़ियात 

चलती है इश्क़ में कोई दानिशवरी * नहीं


**

उम्र-ए-ख़िज़ाँ में आप जतन कुछ भी कीजिये 

नक्श-ओ-निग़ार-ए-रुख़ की कोई इस्तरी नहीं 

**

बरसों से काटती है ग़रीबी में रोज़-ओ-शब

कैसी अवाम है कहे खोटी खरी नहीं

**

घर में न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 26, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर(३९ )

रंग-ए-रुख़सार निखरने का सबब क्या आखिर
आज फिर सजने सँवरने का सबब क्या आखिर
***
आइना बोल उठा अब्र कहाँ बरसेंगे
काकुल-ए-पेचाँ बिखरने का सबब क्या…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 23, 2019 at 7:00pm — 6 Comments

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