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Rahila's Blog (78)

गोली (लघुकथा)राहिला

उसके अब्बा को खानदान में ही बेटी ब्याहनें की जाने कैसी सनक सवार हुई,कि अपने भतीजे से शादी के फरमान की गोली मेरे सीने में दागकर, मेरी और शब्बो की मुहब्बत का जनाज़ा निकाल दिया ।इसके बाद मैंने शहर ही छोड़ दिया और पूरे तीन साल बाद आज जब बस अड्डे पर उतरा तो उसे पूरे साजो सामान और एक छोटे से बच्चे के साथ सामने खड़ा पाकर यूं लगा जैसे किसी ने फिर दिल पर गोली दाग दी हो।मैं लड़खड़ा सा गया और जाने कब, कैसे उसके पास पहुँच गया पता नहीं ।शायद वो मेरी कैफियत समझ गई थी । तभी उसका शौहर रिक्शा लेकर आ पहुंचा ।… Continue

Added by Rahila on March 8, 2016 at 12:22pm — 22 Comments

खट्टी डकारें(लघुकथा )राहिला

13-14 साल के कबाड़ी को कबाड़ तुलवा रहे सेठजी!लम्बी-लम्बी डकारों से परेशान हो रहे थे । जब कुछ ना सूझा तो पास ही खड़ी सेठानी पर झुंझला पड़े । "लगता है आजकल तरकारी में खुले हाथ से तेल मसाला उड़ेल रही हो!मार डाला इन खट्टी डकारों ने "

"अरे कैसी बात करते हैं सेठजी! तेल मसाले खाने से थोड़े ना खट्टी डकारें आती हैं!हम तो रोज ढ़ाबे पर ग्राहकों की बची तेल मसाले वाली तरकारी खाते हैं जुगाड़ से ।

चेहरे से चंचल बातूना लड़का!चहक के बोला ।

"अच्छा..!तो तू बहुत बड़ा जानकार है।तुझे बहुत पता है।"वह… Continue

Added by Rahila on March 5, 2016 at 12:41pm — 10 Comments

सफेद खून (लघुकथा )राहिला

"देखा अब्बा !मैं ना कहती थी कि अपना खून कभी सफेद नहीं होता।आखिर इतने सालों बाद,इतने मनमुटाव के बावजूद,जब भाई को मेरी बीमारी का पता चला तो आखिर सब भुला कर वो और भाभी आ ही गये ना।और पिछले एक महीनें से भाभी मेरा कितना ख्याल रख रही हैं । आपने देखा नहीं क्या? अब आप भी बीती बातें भुला दें।"

"तुम कुछ भी कहो बेटी! मैं उसे बहुत अच्छे से जानता हूं।पता नहीं अब उसे कौन सा लालच यहाँ खींच लाया । "

"अब्बा!आप भी कैसी बातें करते है! अच्छा छोड़े ये सब बातें सोचना,मैं जरा स्कूल का चक्कर लगा कर आती… Continue

Added by Rahila on February 23, 2016 at 6:00pm — 8 Comments

जिन्न(लघुकथा )राहिला

गृहस्थी का काम मिनट -मिनट को पकड़ कर पूरा किये जा रही थी । सारा दिन चकरघिन्नी बनने के बावजूद किसी ना किसी के कोप का भाजन बन ही जाती । मुझे समझ नहीं आता आखिर किस ने ये दुनियादारी के नियम बनाये और किस ने सारे काम का बंटवारा इतने अन्यायपूर्ण ढंग से किया।हाथ पर हाथ धरे सुविधाओं का रसपान करने वाले घर के लगभग सभी सदस्यों के पास "आका "वरदान था और मैं? मैं किसी घटिया सी कहानी के उस जिन्न की तरह थी जो अपने आका के हुकुम पूरा करने में लगा रहता।मैं अकेली थी, तो बहुत दुःखी थी लेकिन तब तक, जब तक कि मैंने… Continue

Added by Rahila on February 19, 2016 at 12:43pm — 19 Comments

एक थी रानी (लघुकथा )राहिला

लंदन से जावेद को लौटे सिर्फ दो दिन ही हुये थे । और इन दो दिनों में वो खूब समझ गया था कि इस बार अम्मी-अब्बू किसी भी सूरत में उसकी शादी से फारिग होना चाहिते हैं। अब वो वक्त आ गया था जब उसे अपनी मुहब्बत का खुलासा कर देना चाहिये।

"अब्बा!मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।"वो सोफे पर धसते हुये बोला ।

"किस बारे में?"

"जी..शादी के बारे में।"

"हां..हां..कहो।"

"दरासल मैं एक लड़की को बहुत पहले से पसंद करता हूं और चाहता हूं कि आप उसके घर पैगाम भिजवा दें।"कह वो अब्बा का चेहरा पढ़ने… Continue

Added by Rahila on February 14, 2016 at 12:03am — 14 Comments

चूक( लघुकथा )राहिला

दरबार खत्म हुये काफ़ी वक्त हो चुका था। लेकिन बादशाह सलामत अभी तक ज़ेहनीतौर पर जैसे वहां से लौटे ही नहीं थे।

"क्या बात है जहांपनाह!आप इतने खामोश?लगता है आज दरबार में कोई खास बात हो गई।"बादशाह को काफ़ी देर से गुमसुम देख बेग़म बोली।

"हम्म..सही कह रही है आप!अभी तक बहुत मुकदमे देखे बेगम!लेकिन आज के जैसा नहीं देखा।

"अच्छा!!ऐसा क्या खास था इस मुकदमे में।"हैरानी से बेगम ने पूछा ।

"एक बूढ़े लाचार बाप ने अपने निहायती बदतमीज,निकम्मे और अय्याश बेटे के खिलाफ मुकदमा दायर ।किया था । उसका… Continue

Added by Rahila on February 7, 2016 at 10:36pm — 27 Comments

ढोर( लघुकथा)राहिला

सांझ ढले एक गडरिया अपनी भेड़े चरा कर लौट रहा था।रास्ते में एक बाजार से गुजर हुआ।वहां एक दुकान मे लगे काले शीशे में अपना अक्स देख,सबसे आगे चल रही भेड़ को दुकान के अंदर दूसरी भेड़ होने का भ्रम क्या हुआ,वो तो दुकान में घुसी ही,साथ उसके भेड़चाल से सारी की सारी भेड़े भी जा घुसी । देखते ही देखते अंदर धमाचौकड़ी मच गई । काफी जतन के बाद जैसे-तैसे उन्हें बाहर निकाला गया ।लेकिन इस घटना के चलते दुकानदार का काफी नुकसान हुआ और नौबत झगड़े तक पहुँच गई । लेकिन कुछ सियाने लोगों के हस्तक्षेप से मामला तूल नहीं… Continue

Added by Rahila on February 3, 2016 at 6:05pm — 29 Comments

सुनता है मेरा खुदा (लघुकथा )राहिला

"बात तब या अब की नहीं जुबान की है बहिन जी!आपकी मांग, अगर रिश्ता तय करने से पहले पता चल जाती तो हम ये रिश्ता करते ही नहीं । लेकिन शादी के ऐन सात दिन पहले ऐसी बात. ..."कह उनके चेहरे से बेबसी झलक गई।

"तो ठीक है अब तोड़ दीजिये,हमारा क्या बिगड़ेगा?बदनामी तो आपकी बेटी की होगी ।और वैसे भी आपने अपनी बेटी की शक्ल देखी है कभी?ऐसी लड़की को तो वैसे भी ज्यादा से ज्यादा ले दे के ठिकाने लगाना पड़ेगा । वो तो एहसान मानिये हमारा जो हम सिर्फ उसकी उच्च शिक्षा के बूते पर उसे कुबूल कर रहे हैं वरना.."कहते -कहते… Continue

Added by Rahila on January 8, 2016 at 10:37pm — 14 Comments

गिरगिट (लघुकथा )राहिला

"ओह, श्रीमती रोहन आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं । कि आप को रोहन जैसा हंसमुख ,जिंदादिल,स्वतंत्र विचारधारा का धनी पति मिला ।ऑफिस की तो जान है,मजाल जो किसी के चेहरे पर उसके रहते उदासी छा जाये।" रात के खाने पर आमंत्रित उनकी महिला मित्र काफ़ी देर से उनकी शान में कसीदे पढ़े जा रही थी ।

"वैसे बुरा ना मानियेगा, अगर रोहन की शादी ना हुई होती तो उसे किसीभी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देती । आखिर ऐसे इंसान की पत्नी होना अपने आप में गर्व की बात है ।सच कह रही हूं ना! " वो अब मेरी राय जानने के लिये…

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Added by Rahila on December 22, 2015 at 1:00pm — 18 Comments

सांप मरा और लाठी साजी (लघुकथा )राहिला

विद्यालय में मध्यान्ह भोजन की दाल में असंख्य इल्ली, तिलूले ,देखकर मैं आपे से बाहर हो गई । तुरंत बच्चों की पंगत उठा कर मैं मध्यान्ह भोजन के ठेकेदार से जम कर उलझ पड़ी । लेकिन वो भी कम ना था, हर बात को "इत्तेफाक "कह के टालने लगा । मुझे दुःख इस बात से ज्यादा हो रहा था कि पता नही कितने दिनों से ये मासूम ऐसा खाना खा रहे है । इत्तेफाक तो मेरे साथ हुआ कि मैं आज प्रभार में थी और ये कृत मेरी जानकारी में आ गया । मैंने तुरंत लिखित कार्रवाई शुरू की । अपने खिलाफ कार्रवाई होते देख उसने गिरगिट की तरह रंग…

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Added by Rahila on December 9, 2015 at 12:00pm — 20 Comments

ड्रीम गर्ल(लघुकथा )राहिला

उस छोटे से कस्बे में अचानक बेहद सुन्दर युवती का आगमन जहाँ एक ओर नुक्कड़ पर खड़े ठलुओं के बीच हलचल का विषय बन गया वहीं उनके लीडर और सबसे सुदर्शन भंवरे रोहन के लिये चुनौती।अब होड़ इस बात की थी कि उस सुन्दरी से सबसे पहले बात करने का सौभाग्य किसे मिलता है । बहुत जतन के बाद सबके अरमान तब ठंडे हो जाते जब वो उन सब को नजरअंदाज कर गुजर जाती । गुजरते वक्त के साथ उसकी बेनियाजी भले ही किसी को इतनी ना अखरी हो लेकिन रोहन के लिये अ़ना का सवाल बन गई थी। ऐसे में एक दिन उसने मित्र मंडली के बीच धमाका किया, कि आज… Continue

Added by Rahila on December 4, 2015 at 5:35pm — 26 Comments

जालिम की दलीलें (लघुकथा )राहिला

"देखो,बच्चे बहुत थक गये है और तुम्हारी हालत भी खस्ता हो रही है । हम खच्चर कर लेते है । ये सुनते ही वो कर्कशा!सुपरिचित वाणी में कूकी-"वाह जी वाह!!फिर कैसी यात्रा?अरे थोड़ा बहुत कष्ट तो होता ही है।फिर मेरी सहेलियां कह रही थीं कि जो पुण्य पैदल वैष्णों देवी जाने में है वो...."उसने अपनी बात को वजनी बनाने में दुनिया की दलीलें दे डाली । मैं उसके स्वभाव से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ था,यात्रा में कोई बदमज़गी ना हो इसलिये हमने उसके आगे हथियार डाल दिये।और चल पड़े । हम खरगोश ना सही,परन्तु वो जरूर कछुये की चाल… Continue

Added by Rahila on November 17, 2015 at 3:36pm — 16 Comments

कोरी शिक्षा (लघु कथा )राहिला

"हां,तो बताओ इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? "

दादाजी!इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी किसी की चीज देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये।बल्कि हमारे पास जो कुछ भी है उसी में संतोष करना चाहिए । "

"शाबाश बेटा! क्योंकि संतोष ही सुख और सुकून की चाबी है । "

तभी -

"अरे आओ -आओ वर्मा जी!कहिये क्या सेवा कर सकता हूं आपकी? "

"बस दो बिस्कुट के पैकेट और एक चाय पत्ती का डिब्बा दे दीजिये । और ये बाहर गुप्ता जी !की दुकान के आगे नई कार खड़ी है ।उन्होनें !ले ली… Continue

Added by Rahila on November 12, 2015 at 4:24pm — 11 Comments

मुफ़्त का माल -(लघुकथा )राहिला

पिताजी!उस कमजोर बकरी को जल्दी हृष्ठ-पुष्ट देखने की चाह में स्नेहवश बागीचे से अलग-अलग किस्म की पत्तियां लाकर लगभग जबरन खिलाने की कोशिश कर रहे थे।लेकिन वो ढीठ की बच्ची भूख शांत होने के बाद किसी चींज को मुंह तक ना लगा रही थी।ये देख वे खीज गये और बोले:

"अरी खा ले कम्बख्त!इतने किस्म की पत्तियां मुफ़्त में मिल रही हैं और तू भाव खा रही है ।"

"अजी!गुस्सा क्यों होते हो जी ! मुफ़्त माल है!वो क्या जाने?जानवर है जानवर, इंसान नहीं है "मां कनखियों से देख, छेड़ लेकर बोली।

.

मौलिक…

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Added by Rahila on November 9, 2015 at 6:00pm — 18 Comments

जरूरत (लघुकथा)

मॉल से दीवाली की ढेर सारी खरीदारी करके जैसे ही कार से गेट के बाहर निकले,एक गुब्बारे बेचने वाला कम उम्र का लड़का दौड़कर आया और गुब्बारे खरीदने की इल्तिज़ा करने लगा।

"अरे नहीं चाहिये भैया !"

"ले लो ना बीबी जी! "

"हां मम्मा ! ले लो ना मुझे चाहिये "

"अरे नहीं बेटा! क्या करोगे?अभी इतने सारे खिलौनें खरीदे है ना।"

"जाओ भैया!हमें जरूरत नहीं ।"उसने झिड़कने के अंदाज में कहा ।

लड़का थोड़ा हताश हुआ और बोला -

"कुछ चीजें जरूरी तो नहीं जब जरूरत हो तभी खरीदी जाए बीबी…

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Added by Rahila on November 3, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

बैरी पिया

"हैलो..शोभा!कैसी हो।"

"मैं ठीक हूं । आप कैसे हैं?"

"बढ़िया,अरे सुनो मैं फिर नहीं आ पा रहा हूं।यहां सीमा पर माहौल लगातार खराब चल रहा है।छुट्टियों की अर्जियां निरस्त हो गयी।"

"दोबारा..भला ये क्या बात हुई"उसके स्वर में उदासी छा गई ।

"यूं उदास ना हो, फौजी की बीबी को हर हाल में सब्र रखना चाहिए।अच्छा ये बताओ..अगर आज स्वयं भगवान तुम्हें कोई वरदान मांगने को कहते तो क्या मांगती? "

"यही मांगती कि बस तुम इसी वक्त मेरे पास आ जाओ"

"ओह..प्रिय,कुछ और मांगना था । ये ख्वाइश तो… Continue

Added by Rahila on October 26, 2015 at 7:12am — 24 Comments

व्यंग्य कविता -"एक बूंद पानी की कीमत "

बिन पानी के अभी से मच रहा,सब ओर हाहाकार।

मई-जून में आयेगा मजा,जब मुंह सूखे लार ।।

नदी,कुंये,ताल का,हो जायगा बुरा हाल ।

पानी के लिये मारामारी,होगी अब की साल ।।

खूब धो रहे घर आंगन, और कर रहे बरबाद पानी।

आटा सानने नहीं मिलेगा,खूब कर लो मनमानी ।।

नहाओ-नहाओ सांझ सबेरे,पर कभी आगे का सोचा ।

गमछा गीला करके बदन पर,लगाना पड़ेगा पोंछा ।।

जो नहा ना पायें बहुत दिनों तक,तो आयेगी ऐसी बास।

कहीं मर गया चूहा या, कहीं सड़ गयी लाश ।।

पटक -पटक के कसेंड़ी बर्तन, होगी… Continue

Added by Rahila on October 24, 2015 at 9:49pm — 14 Comments

स्वेटर (लघुकथा)

जनवरी की हड्डी कंपा देने वाली ठंड..मैं ऊपर से नीचे तक गर्म कपड़ों के बावजूद कांप रही थी ।कक्षा में पहुंच कर एक नजर, मेरे सम्मान में खड़े सभी बच्चों पर डाली और बैठने का इशारा किया । तभी मेरी नजर उन बच्चों पर पड़ी जिनके बदन पर कपड़ों के नाम पर बस कपड़ों का नाम था।मैंने उन सभी बच्चों को खड़ा कर दिया ।

"क्यों!स्वेटर कहां है तुम्हारे?स्कूल से स्वेटर के लिये पैसा मिला ना तुम लोगों को फिर..?"लहजा सख्त था । बच्चे सहम गये ।फिर सामने जो कहानी आई बेशक अलग-अलग थी लेकिन नतीजा एक,कि उनके अभिभावक सारा…

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Added by Rahila on October 18, 2015 at 9:30pm — 39 Comments

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