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राजेश 'मृदु''s Blog (78)

कहो दर्द के देव तुम्‍हारे/चौबारे क्‍यों हमें डराय

कहो दर्द के देव तुम्‍हारे

चौबारे क्‍यों हमें डराय.. .

उदयाचल का

कोई जादू

कंगूरों पर

चल ना पाय

**कल जोड़े

भयभीत किरण भी

पल-पल काया

खोती जाय

पड़े तीलियों

के भी टोंटे

झूठे दीपक कौन जलाय ?

कहो दर्द के.....................

रोटी-बेटी

पर चिनगारी

रोज पुरोहित

ही रख आय

उलटा लटका

सुआ समय का

बड़े नुकीले

सुर में गाय

हर फाटक…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 30, 2013 at 12:30pm — 12 Comments

आओ दिल का दीया जला लो

सद्भावों की थोड़ी खूशबू

सरगम की आवाज बची है

आओ दिल का दीया जला लो

मुट्ठी में थोड़ी राख बची है

नई उमर के गर्म खून से

उठी हुई कुछ भाप बची है

श्रद्धा के कुछ बूंद जमे से

बचपन की एक शाख बची है

आओ दिल का.................

तेरी आरजू मेरी शिकायत

की मीठी तकरार बची है

जग से जाने के कुछ लम्‍हें

जीवन की सौगात बची है

आओ दिल का.................

घुटी व्‍यथा जो…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 24, 2013 at 6:29pm — 15 Comments

शब्‍द

शब्‍द,

तेरी गंध

बड़ी सोंधी है

तेरी देह,

बड़ी मोहक है

अपनी उपत्‍यका में

एक मूरत गढ़ने दोगे ?

देखो न,

तेरे ही आंचल का

वह विस्मित फूल

मोह रहा है मुझे

और मेरे बालों में

अंगुली फिराती

बदन पर हाथ फेरती

मुझे सिहराती

सजाती, सींचती

वो तुम्‍हारी लाजवंती की साख

जब

चांद के दर्पण में

कैद

मेरी प्रतिच्‍छाया को

आलिंगन में भींच लेती है,

और मैं…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 23, 2013 at 12:00pm — 14 Comments

हर किसी को गम यहां पर (राजेश कुमार झा)

हर किसी को ग़म यहां पर

और तो ना दीजिए

हो सके तो मुस्‍कुराते

कारवां रच दीजिए

आ गई जो रात काली

तो नया है क्‍या हुआ

ये तो है किस्‍सा पुराना

राख इसपर दीजिए

लिख रहा जो लाल केंचुल

चीखते मज़हब नए

पोखराजी लेखनी ले

आप भी चल दीजिए

देखना क्‍या ये तमाशे

चार दिन का जब सफ़र

हर लहर को बस किनारे

का पता दे दीजिए

द़श्‍त सहरा खून पानी

लिख चुके कमसिन गज़ल

कुछ तराने अब ख़ुदा के

नाम भी कर दीजिए

दर्द के…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 17, 2013 at 2:30pm — 3 Comments

किसने रंग डाला है बोलो (राजेश कुमार झा)

किसने रंग डाला है ऐसा

मारी किसने पिचकारी

ऐसे ही रंग मोहे रंग दे

हे मुरलीधर बनवारी



बह गए मेरे रेत घरौंदे

टूट गए आशा के हौदे

चाहे जितनी जुगत लगा लूं

कमती ना है दुश्‍वारी



कैसे बिखरे तान सहेजूं

किस जल से ये प्राण पखेजूं

सांझ के अनुपद धूनी रमाए

कह जाओ मुरलीधारी



शेष पहर छाया है पीली

भीत भरी अंखियां हैं नीली

धिमिद धिमिद नव नाद जगाते

आओ हे…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 16, 2013 at 5:05pm — 8 Comments

अदना सा आदमी (राजेश कुमार झा)

एक फसली जमीन को

तीन फसली करने का हुनर.....

धर्म के अंकुश तले

आकुल उड़ान की कला......

अभिशप्त़ कामनाओं को

ममी बनाने का शिल्प.......

कहां जानता है

एक अदना सा आदमी ?



वह जानता है

ताप, पसीना, थकान

विषाद, उत्पीड़न

और उससे उपजी

तटस्थता

जिसको उसने नहीं चुना,



वह जानता है

टीस, चुभन, दर्द, मरण

और इन्हें समेटकर

हो जाता है एकदिन…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 15, 2013 at 6:00pm — 14 Comments

जाने कौन कहां से आकर

जाने कौन कहां से आकर

मुझको कुछ कर जाता है

मेरी गहरी रात चुराकर

तारों से भर जाता है

जाने कौन.........



देख नहीं मैं पाउं उसको

दबे पांव वह आता है

और न जाने कितने सपने

आंखों में बो जाता है

जाने कौन.......



एक दिन उसको चांद ने देखा

झरी लाज से उसकी रेखा

मारा-मारा फिरता है अब

दूर खड़ा घबराता है

जाने कौन....



चैताली वो रात थी भोली

नीम नजर भर नीम थी डोली

वही तराने सावन-भादो

उमड़-घुमड़ कर गाता है …

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Added by राजेश 'मृदु' on January 10, 2013 at 3:00pm — 6 Comments

भौंरों के गुंजार से भी उठ रहा गहरा धुआं

पिंजड़े होकर सजग
देखते हैं आड़ से
धातुमय आवेग ताने
बढ़ रहा क्‍या भार से
एकरंगी ताल-पोखर
सांवली परछाईयां…
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Added by राजेश 'मृदु' on January 8, 2013 at 11:30am — 4 Comments

एक नवगीत का प्रयास

मिर्च बुझी तेजाबी आंखें

हांक रहे चीतल,मृग, बांके

बुदबुद करते मूड़ हिलाते

वेद अनोखे बांच रहे हैं



अर्ध्‍वयु हैं पड़े कुंड में

जातवेद भी खांस रहे हैं



चमक रही कैलाशी बातें

दमक रही तैमूरी रातें

सांकल की ठंडी मजबूरी

खाप जतन से जांच रहे हैं



विविध वर्ण के टोने-टोटके

कितने सूरज फांस रहे हैं



बागड़बिल्‍लों के कमान में

पंजे, नख मिलते बयान में

पड़ी पद्मिनी भांड़ के पल्‍ले

खिलजी जमकर नाच रहे हैं



मिनरल वाटर हलक…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 4, 2013 at 5:06pm — 3 Comments

अब तो मेरी सांसे भी /तेरी जिद से हार गई

मेरी बिखरी सुबह ओंटकर

तुम्‍हीं खड़े थे बाट जोहकर

कभी रूठकर कभी मनाकर

भाव भंगिमा नए दिखाकर

हर फिसलन पर भीत उकेरे

तुम्‍हीं थाम उस पार गई



लिखकर पहला पत्र तुम्‍हीं को

कलम मेरी पथ हार गई



सदा सुहागन तेरी काया

जब समेटती मेरी छाया

और ठठाते हुल्‍लड़ दिन पर

दांत पीसता सूरज जी भर

तभी दमकते श्रृंग ओट…
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Added by राजेश 'मृदु' on January 3, 2013 at 2:22pm — 12 Comments

इन बेखौफ लकीरों ने

हर अध्‍याय

अधूरे किस्‍से

कातर हर संघर्ष

प्रणय, त्‍याग

सब औंधे लेटे

सिहराते स्‍पर्श

कमजोर गवाही

देता हर दिन

झुठलाती हर शाम

आस की बडि़यां

खूब भिंगोई

पर ना आई काम

इन बेखौफ लकीरों ने सबको किया तमाम

फलक बुहारे

पूनो आई

जागा कहां अघोर

मरा-मरा

आकाश पड़ा था

हुल्‍लड़ करते शोर

किसकी-किसकी

नजर उतारें

विधना सबकी वाम

हिम्‍मत भी

क्‍या खाकर मांगे

निष्‍ठुर दे ना दाम

इन बेखौफ…

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Added by राजेश 'मृदु' on January 2, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

मेरा रस्‍ता रोक रही हैं/तेरी ही बातें अक्‍सर

कटु-मधु
कुछ भींगी यादें
लेकर आई
हर दुपहर
ढूंढा जब भी
नया ठिकाना
पहुंच गई
लेकर नश्‍तर

कमतर जिनको आंक रहे थे
कर गए आज मुझे बेघर

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर

हमने जिनको गले लगाया
कर गए वे जीना दूभर

Added by राजेश 'मृदु' on December 21, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

हे देह लता

हे देह लता बन शरद घटा

पर देख जरा यह ध्‍यान रहे

पथ है अपार भीषण तुषार

हे पथिक पंथ का ज्ञान रहे

मन भेद भरे नित चरण गहे

तन मूल धूल यह भान रहे

यौवन सम्‍हार छलना विचार

निर्लिप्‍त दीप्‍त बस प्राण रहे

 

यह नृत्‍य गान भींगा विहान

छाया प्रमाण खम ठोंक कहे

'गढ़ नेह-मोह रच दूं विछोह

जो लेश मात्र अंजान रहे'

 

तज दर्प दंभ हैं ये भुजंग

आभा अनूप नित तूम रहे

दस द्वार ज्‍वार करता…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 12, 2012 at 2:54pm — 5 Comments

तुमको लिखते हाथ कांपते

तुमको लिखते हाथ कांपते

अक्‍सर शब्‍द सिहरते हैं

तुम क्‍‍या जानो तुमसे मिलकर

कितने गीत निखरते हैं

कर लेना सौ बार बगावत

पल भर आज ठहर जाओ

तेरा-मेरा आज भूलकर

चंदन-पानी कर जाओ

 

तुम बिन मेरा सावन सूखा

बादल खूब गरजते हैं

देख रहे जो झिलमिल लडि़यां

बहते अश्‍क लरजते हैं

 

कैसे लिख दूं बदन तुम्‍हारा

बड़ी कश्‍मकश है यारा

बदनाम चमन अंजाम सनम

कलम बिगड़ती है…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 11, 2012 at 12:34pm — 12 Comments

मैं यमुना ही बोल रही हूं

तेरे वादे कूट-पीस कर

अपने रग में घोल रही हूं

खबर सही है ठीक सुना है

मैं यमुना ही बोल रही हूं



पथ खोया पहचान भुलाई

बार-बार आवाज लगाई

महल गगन से ऊंचे चढ़कर

तुमने हरपल गाज गिराई



मेरे दर्द से तेरे ठहाके

जाने कब से तोल रही हूं

लिखना जनपथ रोज कहानी

मैं जख्‍मों को खोल रही हूं



ले लो सारे तीर्थ तुम्‍हारे

और फिरा दो मेरा पानी

या फिर बैठ मजे से लिखना

एक थी यमुना खूब था पानी



बड़े यत्‍न से तेरी…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 6, 2012 at 2:00pm — 17 Comments

मृत्‍यु के बाद

आज नहीं स्‍पंदन तन में

क्षुधा-उदर भी रीते है

स्निग्‍ध शुभ्र वह प्रभा विमल

मुझको खूब सुभीते हैं



देह झरी अवसाद झरे

व्‍यथा-कथा के स्‍वाद झरे

किरण-किरण से घुली मिली

सकल नुकीले नाद झरे



नया जगत आभास नया

लहर-लहर उल्‍लास नया

मदिर मधुर है मुक्‍त पवन

आज गगन में रास नया



वसनहीन अब हूं…
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Added by राजेश 'मृदु' on December 5, 2012 at 4:43pm — 7 Comments

जाओ तूती

नक्‍कारों में

गूंज रही फिर

तूती की आवाज

नहीं जागना

आज पहरूए

खुल जाएगा राज



लाचार कदम

बेबस जनता के

होते ही

कितने हाथ

आधे को

जूठी पत्‍तल है

आधे को

नहीं भात



अकदम सकदम

जरठ मेठ है

और भीरू

युवराज

भव्‍य राजपथ

हींस रहे हैं

सौ-सौ गर्धवराज



आओ खेलें

सत्‍ता-सत्‍ता

जी भर खेलें

फाग

झूम-झूम कर

आज पढ़ेंगें

सारी गीता

नाग



जाओ

इस नमकीन शहर से

तूती अपने…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 26, 2012 at 12:30pm — 2 Comments

मुकरियां (एक प्रयास)

वह अरूप सबके मन भाए
सुध-बुध सबके वह बिसराए
चारू चरण पावन सुखधाम…
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Added by राजेश 'मृदु' on November 23, 2012 at 1:30pm — 12 Comments

कुछ दोहे

कितना कुछ सुलगा बुझा, तेरे-मेरे बीच

ख्‍वाबों में भी हम मिले, अपने जबड़े भींच

कैसे फूलों में लगी, ऐसी भीषण आग

कोयल तो जलकर मरी, शेष बचे बस नाग

जबसे तुम प्रियतम गए, गूंगा है आकाश

तृन-टुनगों पर हैं पड़े, अरमानों की लाश

बिखरा-बिखरा दिन ढला, सूनी-सूनी शाम

तारों पर लिखता रहा, चंदा तेरा नाम

तुम बिन कविता क्‍या लिखूं, दोहा, रोला, छंद

भाव चुराते शब्‍द हैं, लय भी कुंठित, मंद

Added by राजेश 'मृदु' on November 5, 2012 at 12:46pm — 7 Comments

झर गए पारिजात (श्रद्धेय सुनील गंगोपाध्‍याय की स्‍मृति में)

मूक हो गई

रांगा माटी

नीरव नभ

अनुनाद

रम्‍य तपोवन

गुमशुम-गुमशुम

झर गए पारिजात

कासर घंटे

ढाक सोचते

ढूंढ रहे

वह नाद

भरे-भरे मन

प्राण समेटे

भींगे सारी रात

कमल-कुमुदिनी

मौन मुखर हैं

कहां भ्रमर

कहां दाद

पंकिल पथ पर

हवा पूछती

कैसे ये संघात

जाओ अपने

देश को पाती

यह पता

कहां आबाद

अपनी…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 2, 2012 at 1:28pm — 3 Comments

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