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जाने कौन कहां से आकर

जाने कौन कहां से आकर
मुझको कुछ कर जाता है
मेरी गहरी रात चुराकर
तारों से भर जाता है
जाने कौन.........

देख नहीं मैं पाउं उसको
दबे पांव वह आता है
और न जाने कितने सपने
आंखों में बो जाता है
जाने कौन.......

एक दिन उसको चांद ने देखा
झरी लाज से उसकी रेखा
मारा-मारा फिरता है अब
दूर खड़ा घबराता है
जाने कौन....

चैताली वो रात थी भोली
नीम नजर भर नीम थी डोली
वही तराने सावन-भादो
उमड़-घुमड़ कर गाता है
जाने कौन....

ढूंढ रहा हूं उसी निशां को
पूछ थका हूं सारी फिजां को
तुम्‍ही बता दो साथी मेरे
कौन मुझे भरमाता है
जाने कौन .........


राजेश कुमार झा
(मौलिक रचना)

Views: 455

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2013 at 8:16pm

आदरणीय राजेश झाजी, एक अच्छी रचना थोड़ी सी कसर के कारण बहुत अच्छी रचना बनते-बनते रह गयी कहूँ तो कृपया अन्यथा न लेंगे. इस गीत का भाव और कथ्य इतना सुन्दर है कि मन विभोर हो जाता है. उसी अनुरूप इसे बाँधना था.

आपकी अबतक प्रस्तुत हुई रचनाओं ने मेरी एक पाठक के तौर पर आपसे अपेक्षाएँ बढ़ा दी हैं तो मुख्य कारण आप द्वारा हुआ अबतक का उन्नत प्रयास ही है.  सादर..

Comment by राजेश 'मृदु' on January 15, 2013 at 5:37pm

आप सबका सादर आभार


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 13, 2013 at 11:12am

आदरणीय राजेश झा जी,  रचना अच्छी लगी, बधाई स्वीकारें ।

Comment by Anwesha Anjushree on January 11, 2013 at 7:04pm

kahi dur ja din dhal jaay......yeh geet yaad aa gaya....Man ko bhaya aapki kavita...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 11, 2013 at 12:39pm

ह्रदय में प्रीत की दस्तक को १६-१४, १६-१४ मात्राओं की पंक्तियों में खूबसूरती से बाँधा है.कहीं कहीं टंकण त्रुटियाँ हैं, उन्हें दूर कर लें.

हार्दिक बधाई इस अभिव्यक्ति पर आ. राजेश झा जी 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 3:47pm

aadarniy rajesh jii

saadar 

sundar rachna badhai 

कृपया ध्यान दे...

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