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ग़ज़ल ( उनको ही चाहा करेंगे... )

अब उनकी बेरुखी का न शिकवा करेंगे हम
लेकिन यह सच है उनको ही चाहा करेंगे हम ।

जायेंगे वो हमारी गली से गु़ज़र के जब
बेबस निगाह से उन्हें देखा करेंगे हम ।

तन्हाईयों में याद जब उनकी सताएगी
दिल और जिगर को थाम के तदपा करेंगे हम

करते नही कबूल मेरी बंदगी तो क्या
बस उनके नक्शे पा पे ही सजदा करेंगे हम ।

"अलीम" अगर वो यारे हसीं मेहरबान हो
जीने की थोडी और तम्मान्ना करेंगे हम ।

Added by aleem azmi on June 12, 2010 at 9:49pm — 5 Comments

सुन्दरकांड से

सुन्दरकांड

जामवंत के बचन सुहाए ! सुनि हनुमंत हर्दय अति भाए !!

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ! सहि दुख कंद मूल फल खाई !!

जब लगि आवों सीतहि देखी ! होइहि काजू मोहि हरष बिसेषी !!

यह कहि नाइ सबन्हि कहूँ माथा ! चलेउ हरषि हिएँ धरि रघुनाथा !!

सिंधु तीर एक भूधर सुन्दर ! कौतुक कूदी चढ़ेउ ता ऊपर !!

बार बार रघुबीर संभारी ! तरकेउ पवनतनय बल भारी !!

जेहि गिरि चरन देई हनुमंता ! चलेउ सो गा पाताल तुरंता !!

जिमि अमोध रघुपति कर बाना ! एही भांति चलेउ हनुमाना !!

जलनिधि… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on June 12, 2010 at 7:14pm — 7 Comments

कुछ बाते जो बुजुर्गो से सुना हु ध्यान देने योग हैं ,

कुछ बाते जो बुजुर्गो से सुना हु ध्यान देने योग हैं ,

१. नाशवान को महत्व देना ही बंधन हैं ,
२ सत्य ही कलिकाल की तपस्या हैं ,
३. नम्रता से कही हुई कठोर बाते भी अच्छी लगती हैं,
४ वस्तु , ब्यक्ति से सुख लेना महान जड़ता हैं,
५. यदि शांति चाहते हो तो कामना का त्याग करो ,
६. परमात्मा की प्राप्ति में भाव की प्रधानता हैं.
७. सच्ची बात को मान ले ये सत्संग हैं.
८. कiम करते समय भगवान को मत भूलो ,

अच्छा लागे तो गाठ बांघ लो भाई ,

Added by Rash Bihari Ravi on June 12, 2010 at 6:45pm — 1 Comment


मुख्य प्रबंधक
"बाल मजदूरी ठीक नहीं"

चाय पिला पिला कर ,

लोगो की सेवा वो करता रहा,

महज़ चार चाय की कीमत पर ,

मालिक उसको छलता रहा,

भूखी अंतड़िया ,

क्या जाने चाय की तलब ,

दो रोटियां, चोखे संग,

पाने को पेट जलता रहा ,

बैठे चायखाने मे

खादी पहने

कुछ उच्च शिक्षित लोगों के मध्य

"बाल मजदूरी…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 12, 2010 at 3:00pm — 27 Comments

सुविधाभोगी

(प्रस्तुत कविता हिंदी के विद्वान कवि प० राम दरश मिश्र द्वारा सम्पादित पत्रिका ' नवान्न ' के द्वितीय अंक में प्रकाशित है, मेरी इस कविता को उन्होनें गंभीर कविता का रूप दिया था )



न तो ---

मेरे पास

तुम्हारे पास

उसके पास

एक बोरसी है

न उपले है

न मिटटी का तेल

और न दियासलाई

ताकि आग लगाकर हुक्का भर सकें ॥

और न कोई हुक्का भरने की कोशिश में है ।



सब इंतज़ार में है

कोई आएगा ?

और हुक्का भर कर देगा ।

आज !

हर कोई

पीना…
Continue

Added by baban pandey on June 12, 2010 at 5:53am — 2 Comments

पिचकू पाड़े ,

डॉक्टर के पास पहुचे प्यारे प्यारे पिचकू पाड़े ,

बोले डाक्टर साहब क्या काम है पिचकू भाई ,

संग में जो आये बोले, परेशान हैं पिचकू पाड़े ,

बावन जोड़ा पूड़ी रात में ये खाये थे ,

संग में दही तीन किलो उड़ाये थे ,

घर का खाना ये कभी न खाते हैं ,

एक दिन खाकर तीन दिन तक पचाते हैं

सुबह से परेशान हैं, होती हैं खूब दौड़ाई ,

रुक जाये भागम-भाग,जल्दी दे दो कुछ दवाई ,

डाक्टर बोला थोड़ा कम तो खाओ यार ,

उम्र बढ़ी हैं कुछ तो अपना रखो ख्याल ,

डॉक्टर को भी बडे प्यार… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on June 11, 2010 at 8:00pm — 2 Comments

सलाईआ

दफ्तर जाते हुए सेक्टर ६२ नॉएडा से रिक्शा लिया, बैठते ही किसी को सिगरेट फूंकते देखकर धूम्रपान की तलब हुयी तो मैंने भी फौरन सिगरेट सुलगानी शुरू कर दी ! लेकिन हवा तो जैसे मेरे पीछे ही पडी हुयी थी .. एक ..दो ...तीन .. चार, मगर यह क्या ? माचिस की तीलियाँ तो बुझती ही जा रही थीं और मेरी सिगरेट सुलग नहीं पा रही थी ! तब एकदम ख्याल आ गया उस पुरानी माचिस का जो बचपन में घरो में आम हुआ करती थी ! पतली प्लाईवुड कवर वाली और नीले कागज़ वाली .. शायद एक्का माचिस थी ! क्या माचिस हुआ करता थी - एकदम मोटी सी लकड़ी,… Continue

Added by Anand Vats on June 11, 2010 at 6:00pm — 5 Comments

महाभारत- सार

राजा और दरबार की, परलोक की-संसार की.

गाथा है भगवान् और इंसान के व्यवहार की.

शाप की-अभिशाप की, अनुराग की-वैराग की.

घात की-आघात की, कहीं छल- कपट-प्रतिघात की.

मिलन की-वियोग की, दुर्योग की- संयोग की.

नीति की-कुनीति की, कहीं रीति की- राजनीति की.

बात ये आचार की, विचार की- संस्कार की.

गाथा है भगवान् और इंसान के व्यवहार की.

ज़िन्दगी की- काल की, कहीं भूत की- बेताल की.

शास्त्र की- शास्त्रार्थ की, कहीं जादुई ब्रम्हास्त्र की.

नाथ की- अनाथ की, कहीं बात की-… Continue

Added by satish mapatpuri on June 11, 2010 at 12:30pm — 4 Comments

संसद भवन में

स्वांग धरे तरै तरै

कुरता और टोपी धरे

देखो कैसे कैसे आए

संसद भवन में



बातें करे बड़ी बड़ी

जनता की है किसे पड़ी

वही तो नेता कहाए

संसद भवन में



राज राज करे बस

नीति सारी भूल जाएँ

हैं सारे छंटे-छंटाये

संसद भवन में



भूख से हैं मरते जहाँ

हजारों औ लाखों लोग

ये बिना डकारे खाएं

संसद भवन में



इसे खरीद, उसे बेच, इसे जोड़, उसे तोड़

जैसे तैसे करके, लेते ये आकार हैं

ऐसे में भलाई की सुधि कब कौन… Continue

Added by दुष्यंत सेवक on June 11, 2010 at 11:41am — 5 Comments

हमलोग चोर है

(मित्रो , मैं लगातार मानव -मूल्यों में हो हरास के ऊपर लिखते जा रहा हू , प्रेम सम्बन्धी कविताये बनाना मेरे लिए कठिन कार्य है ...प्रस्तुत है एक और कविता ...आशा है आपका समर्थन मिलता रहेगा ॥)



चीर चुराना (चीर -हरण ) तो

हम महाभारत काल से जानते है ॥



बिजली की चोरी

मेरा शगल है ॥



इन्कम -टैक्स की चोरी

आम बात है ॥



बनिए द्वारा तौल की चोरी में

हर्ज़ क्या है ॥



परीछा में चोरी

लड़के -लडकियों का हक है ॥



रचनाये… Continue

Added by baban pandey on June 11, 2010 at 8:24am — 3 Comments

आँखे बोलती है

जिन आँखों में देखा था

प्यार का सागर

उसी में तलाक का तूफान देख

हैरान है आँखे ॥



जिन आँखों में देखा था

विस्वास का दरिया

उसी में बेरुखी देख

परेशान है आँखे ॥



जिन आँखों ने देखी थी

सच की किताब

उसी में झूठ का पुलिंदा देख

बेजुवान है आँखे ॥



घर लौट आओ , मेरे दोस्त

जंगलो में अब बहुत हो चूका

माँ का बेटे के वियोग में

लहू -लुहान है आँखे ॥



जिन आँखों ने देखे थे

घूँघट में चेहरा

नंगे हुस्न की तारीफ़… Continue

Added by baban pandey on June 11, 2010 at 5:45am — 4 Comments

तब क्यों न देखा !तुमने मुझे जी भर के ॥

भीग जाती थी तेरी आँखें, मुझे याद करके ,
तब क्यों न देखा !तुमने मुझे जी भर के ॥

जब सामने थी तो न ,टिक सकी ये मुझ पर ,
अब क्यूँ करती हैं शिकवा, ये रह -रह करके ॥

इनकी उल्फत का न कोई ,सानी है इस जहाँ में ,
बसाये रखती हैं ये यादें ,अपने में मर करके ॥

कौन समझे इन आँखों की, दीवानगी को ''कमलेश ''
भीगने की अदा अता की, खुदा ने इनको जी भर के ॥

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on June 10, 2010 at 9:39pm — 1 Comment

इक-इक कतरे का....!!

अपने लहू के इक -इक कतरे का हिसाब चाहिए !

फंदे पर लटकते 'अफज़ल'और'कसाब'चाहिए!



जिनका बहा है खून जरा ,उनके दिल से पूछिए ,

जो देखा था आँखों ने वो , सुंदर सा ख्वाब चाहिए !



कितनी गैरत बाकि है इस देश में ,गैरों के लिये ,

क्यों ? ये मेहमान नवाजी इनकी .जवाब चाहिए !



जिंदगियोंमें जो अँधेरा किया, इन जालिमों ने ,

इनमे रोशनी भरने को, हजारों महताब चाहिए !



इनकी जड़ों को काट दो ,जहाँ से ये निकलती है ,

उन शहीदों की आत्माओं को, भी इंसाफ चाहिए… Continue

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on June 10, 2010 at 9:02pm — 2 Comments

दिल में सवाल था ,

दिल में सवाल था ,
बड़ा बेमिसाल था ,
लेकिन हम डर डर के ,
अनोखा काम किया ,
था तो सुंदर वो ,
उसको सजाकर मैं ,
अति सुंदर किया ,
जिस के पास भाई ,
अह ना आये ,
उसी का नाम गुरु ,
सही में कहलाये ,
आपने जो कहा ,
वही सर आखो पे ,
मेरे लिए कुछ भी करे ,
सर अब ना डरे ,
डर से अपना ही ,
होना नुकसान था ,
दिल में सवाल था ,
बड़ा बेमिसाल था ,

Added by Rash Bihari Ravi on June 10, 2010 at 2:30pm — 2 Comments

मैं इन्सान हु इंसानियत भूल गया ,

मैं इंसान हू ,

इंसानियत भूल गया ,

मानवता से कुछ लेना देना नहीं .

वो हमसे कोशो दूर गया ,

आपकी नजर में ,

मानवता के लिए जो हम लड़ते हैं ,

हम अपने फायदा के काम करते हैं ,

जगह जगह पोस्टर लगवाता हू ,

काम से ज्यादा अपना नाम चमकाता हू ,

मैं खुद को इतना बुलंद करना चाहता हू ,

की सामने वाला भींगी बिल्ली लगे ,

मैं इंसान हू ,

इंसानियत भूल गया ,

कोई सड़क पर मर रहा हैं .

पानी के लिए तरस रहा है,

मैं मानवता का पक्षधर हू ,

सरकार ने लाल… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on June 10, 2010 at 1:00pm — 2 Comments

झूला

कई बार झूला हुं

सावन के झूले में

कई बार झूला हू

यादों के झूले में

और तेरी बाहों के झूले में भी

कई बार झूला हू मैं ॥



पर अब ये झूले

कोई गर्मी नहीं देती



कई झूले है

झूलने को अब मेरे पास

धर्म के झूले में झुलना

मेरी नियति है

बातों और वादों के

झूले में झुलना

हमारी दिनचर्या में है ॥

हमारे नेता हमें

झुलाते है ...रोलर -कोस्टर के

झूले में ॥

त्रिया -चरित के झूले में झुलना

एक रोज नए अनुभव से गुजरना है… Continue

Added by baban pandey on June 10, 2010 at 11:56am — 2 Comments

आदमी एक दो मुहां साँप है

आदमी....

कभी बाघ बन दहाड़ता है

कभी कुत्ता बन लड़ता है

कभी गिद्ध बन मांस ग्रहण करता है

तो कभी

गीदर बन भाग खड़ा होता है

कभी गिरगिट की तरह रंग बदलता है



आदमी.....

कभी धर्म के लिए स्वं मरता है

कभी दूसरों को मारता है / काटता है



आदमी ......

कभी देश बाटता है

कभी जाती बाटता है

कभी भाषा बाटता है

तो कभी एकता का पाठ पढ़ाता है



आदमी ....

कभी कंजूस बन पैसे के लिए मरता है

कभी दानी बन पैसे लुटाता है

कभी… Continue

Added by baban pandey on June 9, 2010 at 3:00pm — 5 Comments

ना मैं तुलसी हू....

मैं ना तो कोई तुलसीदास

जो दोहावली सजाऊँ,

ना ही मैं कबीर कोई

कि भजनमाल बुन पाऊँ !



सूरदास की भक्ति कहाँ

जो गीत श्याम के गाऊँ,

ओज सुभद्रा सा भी नहीं,

ना टैगोर का सुर बना पाऊँ !



फिर भी दिल में ये चाहत है,

में दिल की बात सुनाऊँ,

और प्यार दोस्तों का कहता है,

में भी कलम उठाऊँ !



मुझमे ऐसा कुछ भी नहीं,

कि में कुछ भी बन जाऊं,

प्यार आपका होगी वजह,

जो कुछ सार्थक कह पाऊँ !



मित्रों की प्रेरणा शक्ति… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on June 9, 2010 at 2:00pm — 3 Comments

पेंडुलम .

पेंडुलम .

पेंडुलम यही समझ रहे हो ना मुझे ,

यही भूल अगली सरकार की थी ,

और तुम्हे मिल गया ये मलाई ,

जिसे बारे प्यार से आपस में ,

बाटकर मस्ती से खा रहे हो ,

हमें चाहिए एक होनहार कर्मनिस्ट,

जो समझे हमें जाने हमें ,

और तुम हो की जानना ही नहीं चाहते ,

लोकतंत्र में युवराज दिखा रहे हो ,

यही ना हमें पेंडुलम समझ कर ,

उल्लू बना रहे हो ,

जिस जनता को तूम उल्लू समझ रहे हो ,

ओ सब जानती हैं ,

कोई पानी तक नहीं मांगता ,

जब ओ मरती हैं… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on June 9, 2010 at 12:55pm — 4 Comments

मुक्तिका: ...चलो प्रिय. ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
...चलो प्रिय.
संजीव 'सलिल'
*
लिये हाथ में हाथ चलो प्रिय.
कदम-कदम रख साथ चलो प्रिय.

मैं-तुम गुम हो, हम रह जाएँ.
बन अनाथ के नाथ चलो प्रिय.

तुम हो मेरे सिर-आँखों पर.
मुझे बनाकर माथ चलो प्रिय.

पनघट, चौपालें, अमराई
सूने- कंडे पाठ चलो प्रिय.

शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.

'सलिल' न भाती नेह-नर्मदा.
फैशन करने 'बाथ' चलो प्रिय.

***********************

Added by sanjiv verma 'salil' on June 9, 2010 at 11:58am — 7 Comments

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