For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Manan Kumar singh's Blog – September 2015 Archive (6)

गजल(मनन)

122 122 122 122

हिमालय बना था पड़ा ढल रहा हूँ

पिघलकर बना मैं नदी चल रहा हूँ।

उसाँसें धरा की सहेजे-सहेजे

बना मैं घटा कर अभी मल रहा हूँ।

बहा हूँ कभी मैं ढुलकता रहा था

अभी भी उसी आँख में पल रहा हूँ।

रही आग है जो जलाती- बुझाती

उसी आग में मैं अभी गल रहा हूँ।

जली थी कभी जो कहूँ नेह-बाती

अभी मैं वही लौ बना जल रहा हूँ।

पला था सपन जो घनेरे-घनेरे

रंगा मन उसीमें अभी चल रहा हूँ।

उषा की नवेली किरण तब हँसी थी

कभी बल रहा मैं कभी जल रहा… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 29, 2015 at 2:59pm — 4 Comments

गजल

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन



तू भले कुछ भी कहे मैं कामना करता रहूँगा

रूप रस की चाहना- आराधना करता रहूँगा।

जल रहा संसार खुद से आग अपनी ही जलाये

बाँट आया प्यार घर- घर याचना करता रहूँगा।

जो लगाते आग चलते ज्वाल उनको हो मुबारक

मैं चला हूँ मेघ बनकर साधना करता रहूँगा।

दे रही जो दर्द चपला कर सकूँ बे-दर्द उसको

हो धरा मैं सोंख लूँ यह कामना करता रहूँगा।

आदमी हो आदमी का हो गया सब भूलकर भी

आदमी के हित रहूँ मैं प्रार्थना करता…

Continue

Added by Manan Kumar singh on September 22, 2015 at 10:00pm — 8 Comments

गजल

गजल छंद-दिक्पाल/मृदुगति
मापनी221 2122 221 2122
होता वही कभी जो चाहा किया समय है
होता रहा कभी जो करता चला समय है।
चाहा बहुत कि मोडूँ उलटा चलन हुआ कब
मानी न ही कभी तो उसने बड़ा समय है।
खूबी रही वही हाँ ना की अभी कहूँ तो
छू ले गगन अभी वो सीढ़ी लगा समय है।
चाहा उसे बना दूँ अवतार नज्म का मैं,
उड़ती रही घटा सी हर पल रहा समय है।
उसकी अदा नफीसी कैसे करूँ बयाँ मैं,
नजरें बचा नजर कर लेती फिरा समय है।
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Manan Kumar singh on September 10, 2015 at 10:00am — 9 Comments

गजल

2122 2122 2122

लग गये दिल चाँद अब धरती उतारें।

ठान ली है आ यहीं सरसी उतारें।

खूब मचली हैं घटायें झूमती- सी

आ अभी उनको जली परती उतारें।

सूखती जो दूब भी अब चाहती है

जिंदगी कुछ पल अभी मरती उतारें।

आरजू तब की हमारी माँगती कुछ

अब तलक घातें रहीं ठगती उतारें।

हो चुकी बातें बहुत बोलूँ कहूँ क्या

हो गयी जो बात अब जगती उतारें।

मौन आँखों से भिंगोने थी चली वह

रह गयी जाने कहाँ चरती उतारें।

ख्वाहिशें अबतक थमी थीं नामुरादें

रे नहीं फिर वे… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 7, 2015 at 8:26pm — 5 Comments

गजल(मनन)

हर तरफ आखिर हँसी छा गयी है

आज कौवे को चिड़ी भा गयी है।



काँव कितनी बार करता रहा वह,

ठाँव उसके आज मैना गयी है।



टक लगा बगुला रहा था कभी से,

चोंच मछली एक छलक आ गयी है।



देख वंशी है लगी हो कहीं कुछ,

लोग बोलें टोना' ले जा गयी है।



साँढ़ बूढ़ा कुलबुलाया शहर में,

देख बछिया खुद अचंभा गयी है।



विश्व-जय सी हो गयी तो अभी है

कंत-घर अमृत नवोढ़ा गयी है।



बाग़ में बुलबुल अभी गा रही थी,

क्यूँ न जाने चुप हवा छा गयी…

Continue

Added by Manan Kumar singh on September 6, 2015 at 7:30pm — 5 Comments

पता(पता)

पता(लघु कथा)

-आप मुम्बई में रहते हो?मैंने तो कुछ और सोचा था।मैं भी तो मुम्बई में ही हूँ।

-अच्छा,कहाँ?

-एन एम

-वो क्या हुआ?

-मुम्बईकर को तो जानना चाहिये

-अच्छा,बताइये

-लेकिन यह आपको पता होना चाहिए

-अपना पता न बताने के बहुत-से बहाने होते हैं।

-आप एन एम नहीं जानते,तो मुम्बई में क्या जानते हैं?

-दोस्तों को जो अपने पते कभी कुछ,तो कभी कुछ बताते हैं ।

-देखिये,कोल्हापुर तो मेरा मायका है,मुम्बई तो ससुराल हुई।

फिर किंचित ख़ामोशी के उपरांत फेसबुक… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 3, 2015 at 7:53am — 12 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास…See More
10 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और…"
12 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर सर द्वारा…"
12 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय सदस्यों को नमस्कार, एक महत्वपूर्ण चर्चा को आरम्भ करने के लिए प्रबन्धन समिति बधाई की…"
12 hours ago
Admin posted a discussion

ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा

साथियों,विगत कई माह से ओ बी ओ लाइव आयोजनों में कतिपय कारणवश सदस्यों की भागीदारी बहुत ही कम हो रही…See More
13 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय  अखिलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित "
20 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय सुशीलजी हार्दिक बधाई। लगातार बढ़िया दोहा सप्तक लिख रहें हैं। घूस खोरी ....... यह …"
22 hours ago
Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Mar 4
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Mar 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Mar 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service