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Hari Prakash Dubey's Blog – July 2017 Archive (7)

कालिख: लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

“सुन कमला, सारा काम निपट गया या अभी भी कुछ बाकी है!”

नहीं ‘मेमसाहब’ सब काम पूरा कर दिया है, दाल और सब्जी भी बना के फ्रिज मैं रख दी है, आटा भी गूंथ दिया है, साहब आयेंगे तो आप बना कर दे दीजियेगा !

“अरे बस जरा सा ही काम तो बचा है, कमला,ऐसा कर रोटी भी बना कर हॉट केस मैं रख जा !”

“मेमसाहब मुझे देर हो रही है, घर पर बच्चे भूखे होंगे !”

अरे चल पगली १५ मिनट में मर थोड़ी ही जायेंगे, चल जल्दी से बना दे !

गरीबी चाहे जो न…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 25, 2017 at 2:49am — 5 Comments

दिल्ली में सूरज: कविता :हरि प्रकाश दुबे

दिल्ली में भी

सूरज उगता है

शहादरा में

काले धुएं की, ओट से

धीरे –धीरे संघर्ष करते

ठीक उसी तरह जैसे

माँ के गर्भ से कोई

बच्चा निकलता है

बड़ा होता है

बसों और मेट्रो में

लटक –लटक कर

धक्के खा-खा कर

जीवन जीना सीखता है

पसीने को पीता जाता है

पर थक हार कर भी

जनकपुरी की तरफ बढ़ता जाता है

रक्त से लाल होकर

वहीँ कहीं किसी स्टाप पर

चुपके से उतर जाता है

पर, सूरज का जीवन…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 24, 2017 at 11:10pm — 1 Comment

मुहब्बत की दावत: ग़ज़ल: हरि प्रकाश दुबे

122--122 / 122--122

मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत लिखेंगे,

अलावा नहीं कुछ हिमाकत लिखेंगे !

 

नहीं कल्पना ही लिखेंगे यहाँ अब,

लिखेंगे तो बस हम हकीकत लिखेंगे!

 

लिखेंगे नहीं हम कभी झूठ बातें,

सलामत अगर हैं सलामत लिखेंगे!

 

मुहब्बत ही करते रहें हैं यहाँ जो ,

ग़ज़ल दर ग़ज़ल हम मुहब्बत लिखेंगे!

 

ग़ज़ल जब लिखेंगे तुम्हारे लिए तो,

कसम से तुम्हें खूबसूरत लिखेंगे!

 

इशारा हमें जो किया…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 18, 2017 at 5:11pm — 11 Comments

बंधन : लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

शानदार फूलों से सुसज्जित मंच पर धर्मगुरु विद्यमान ,साथ ही भजन कीर्तन करने वाली भाड़े पर रखी गयी  टीम ,सामने लम्बा पांडाल , अति विशिष्ट भक्तों के लिए आगे सुन्दर सोफों की कतार ,पीछे दरी पर हाथ जोड़ कर बैठे भक्तजन , जगह –जगह एलसीडी ,साउंड सिस्टम , अब प्रवचन शुरू ..........

 

” आप सब के दुखों का कारण ही यही है की आप लोग तमाम मोह ,माया के बंधन में फसें हुए हैं,किसी को परिवार की चिंता है ,कोई धन के पीछे भाग रहा है ,अरे कुत्ते की तरह जिंदगी बना ली है आप लोगों ने अपनी, अरे मैं तो…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 3:00pm — 4 Comments

अंत का आरम्भ : लघुकथा : हरि प्रकाश दुबे

“डॉक्टर साहब, देखिये ना मेरी फूल सी बिटिया को क्या हो गया है, कुछ दिनों से ये अचानक दौड़ते-भागते हुए गिर जाती है, ठीक से सीढ़ियाँ भी नहीं चढ़ पाती है।“

“अरे आप इतना क्यों घबरा रहें है? लीजिये कुछ टेस्ट लिख दियें हैं, बच्ची की जाँच करवा के मुझे दिखाइये ।“-डॉक्टर ने कहा।

अगले ही दिन बृजमोहन सारी जाँच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर मिश्रा के अस्पताल पहुँच गया।

डॉक्टर मिश्रा जैसे –जैसे रिपोर्ट पढ़ते जा रहे थे…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 15, 2017 at 9:30pm — 12 Comments

तिरंगे का सौदा :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

सर्द रात में कोहरे को चीरती हुईं कई गाड़ियाँ, आपस में बतियाती हुयीं शहरों की झुग्गियों में कुछ ढूँढ रहीं थी तभी अचानक !

 

“अबे गाड़ी रोक, बॉस का फ़ोन आ रहा है I”

 

ड्राईवर ने कस कर ब्रेक दबा दिया और धमाके के साथ “जी, साहब , कहते ही आदमी फ़ोन सहित गाडी के बाहर I”

 

“अबे ! यह धमाका कैसा सुनाई दिया, जिन्दा हो या फ्री में खर्च हो गए ?”

 

“नहीं जनाब, सब ठीक है, लगभग सब काम हो गया है, सारे छुटभैये नेता खरीद लिए हैं!” “अल्लाह ने चाहा तो…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 11, 2017 at 12:51am — 10 Comments

सावन में बादल :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

 

“खाना लगा दूं ! लेफ्टिनेंट साहब ?”

“अभी नहीं ! रूक जा जरा, बस यह चित्र पूरा ही होने वाला है, तब तक जरा एक पैग बना ला ‘ऑन द रोक्स’ I”

“क्या साब, आज दिन में ही...?”

“हूँ ! ... बेटा, एक काम कर सारे खिड़की दरवाजे बंद कर दे और लाइट्स जला दे I”

थापा ने ठीक वैसा ही किया, पैग बना लाया और बोला, “लीजिये साब, हो गयी रात I”

लेफ्टिनेंट साहब अपनी बैसाखी के सहारे मुस्कराते हुए आगे बढे, गिलास पकड़ लिया और बोले…

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Added by Hari Prakash Dubey on July 10, 2017 at 10:47pm — 5 Comments

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