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सोने का संसार !

उषा छिप गयी नभस्थली में,

देकर यह उपहार !

लघु–लघु कलियाँ भी प्रभात में,

होती हैं साकार !

प्रातः- समीरण कर देता है,

नव-जीवन संचार !

लोल-लोल लहलही लतायें,

नव-जीवन-संचार !

झुकी जा रही हैं ले तन में,

नव यौवन का भार !

भ्रमर छूटकर पंकज दल से,

करने लगे विहार !

भानु-करों ने खोल दिया है ,

काराग्रह का द्वार

कल-किरणें हैं शयन-सदन की ,

मंजुल वंदनवार !

सजनी रजनी की सुख स्मृति ही,

बस अब है आधार !

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

  

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 11, 2015 at 9:17pm

उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी साहब सादर ! एक निवेदन है अपने नाम की हिंदी में लिपि  टाइप कर के भेज दें ! 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 11, 2015 at 8:58pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, आपका विश्लेषण सही है , देखिये मंच पर ही सीख रहा हूँ , मार्दर्शन करते रहिएगा ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 11, 2015 at 8:57pm

प्रिय सोमेश भाई आपकी प्रतिक्रिया, उत्साहवर्धन और सराहना हेतु दिल से आभार.

 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 11, 2015 at 8:55pm

आदरणीया प्रतिभा त्रिपाठी जी , रचना पर आपकी उपस्तिथी ,उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार  , सादर!

 

Comment by khursheed khairadi on February 10, 2015 at 11:32pm

लोल-लोल लहलही लतायें, सजनी रजनी की सुख स्मृति ही, लघु–लघु कलियाँ भी प्रभात में,

आदरणीय हरिप्रकाश जी सुन्दर कविता में बहुत  ही सुन्दर मनभावन अनुप्रास की छठा बिखेरी गई है ,हार्दिक बधाई |सादर अभिन्दन | 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 10, 2015 at 7:43pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  सादर धन्यवाद ! 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 10, 2015 at 7:41pm

आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया सर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 10, 2015 at 7:38pm

रचना की मुक्तकंठ से प्रशंसा हेतु हार्दिक आभार भाई मिथिलेश वामनकर जी। आपका सुझाव भी शिरोधार्य है ,ठीक करता हूँ ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 10, 2015 at 7:33pm

आदरणीया सविता मिश्रा जी, रचना की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by somesh kumar on February 9, 2015 at 10:54pm

सुंदर शब्दों में प्रभात कल का मनोहरी वर्णन |सुंदर प्रस्तुति पर बधाई भाई जी |

कृपया ध्यान दे...

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