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जयनित कुमार मेहता's Blog – June 2016 Archive (5)

कहाँ तक ज़िन्दगी से भागियेगा (ग़ज़ल)

1222 1222 122

हर इक चेहरे पे था चेहरों का पर्दा
तभी तो खा गया आईना धोखा

तुम्हारी मौत मेरी ज़िन्दगी है,
अँधेरा रौशनी से कह रहा था

नहीं छोड़ेगी पीछा मरते दम तक,
कहाँ तक ज़िन्दगी से भागियेगा।

निहत्था आफ़ताब आया फ़लक पर,
अभी हमला भी होगा बादलों का।

वफ़ा की बात फिर करने लगा मैं,
रिएक्शन ये दवा का हो गया क्या?

"जय" अब तो छोड़ करना सौदा-ए-दिल
हुआ कंगाल तू सह-सह के घाटा

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on June 30, 2016 at 6:42pm — 13 Comments

हाल-ए-दिल पूछने चले आये (ग़ज़ल)

2122 1212 22



हाल-ए-दिल पूछने चले आये।

जाइए, जाइए.....बड़े आये।



उनके नज़दीक हम गये जितने,

दरमियाँ उतने फ़ासले आये।



आपके शह्र, आपके दर पर,

आपका नाम पूछते....आये।



राह-ए-मंज़िल में करने को गुमराह,

जाने कितने ही रास्ते आये।



हुए रावण के अनगिनत मुखड़े,

राम-राज अब तो कोई ले आये।



ज़ीस्त का मस्अला नहीं सुलझा,

जाने कितने चले गए, आये।



ढूँढे मिलता नहीं हमारा दिल,

हाथ किसके न जाने दे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on June 28, 2016 at 4:02pm — 22 Comments

बहुत खुश हैं हम अपने बोरिये पर (ग़ज़ल)

1222 1222 122



बिछाया जिसने कंकड़ रास्ते पर

वो क्यों चुपचाप है इस हादिसे पर



अना के बदले सबकुछ मिल रहा था

हमीं राज़ी नहीं थे बेचने पर



हमारे पाँव में जब मोच आई

थी मंज़िल कुछ क़दम के फासले पर



ज़ुबाँ सिल ले, जिसे है जान प्यारी

कटेंगे सर यहाँ, सच बोलने पर



अधिष्ठाता वही इस देश के हैं

अभी तक जो रहे हैं हाशिये पर



मकाँ तब्दील हो जाता है घर में

डिनर पर, या सवेरे नाश्ते पर



बिठाए आपको पलकों पे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on June 17, 2016 at 10:00pm — 6 Comments

ज़बाँ दिल की सुख़नवर बोलता है (ग़ज़ल)

1222 1222 122



ज़बाँ दिल की सुख़नवर बोलता है

वो सारी बातें खुलकर बोलता है



हमारी खाक़सारी की बदौलत

जिसे देखो, अकड़कर बोलता है



वो, जिसको पूजती है सारी दुनिया

ये नादाँ उसको पत्थर बोलता है



सियासत से जो वाकिफ़ ही नहीं है

सियासी मसअलों पर बोलता है



ज़ुबाँ का ज़ह'र बाहर आ न जाए

वो ले के मुँह में शक्कर, बोलता है



जुबानें कट चुकी हैं क़ायदों की

यहाँ अब सिर्फ पॉवर बोलता है



तुम्हारा शीशा-ए-दिल चूर… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on June 12, 2016 at 5:15pm — 8 Comments

शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर (ग़ज़ल)

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आसमाँ हम भी छू ही लेते,मगर

काट डाले गए हमारे पर



हमको काँटों की राह प्यारी है

आप ही कीजे रास्तों पे सफ़र



अपनी आँखों में जुगनू बसते हैं

हम पे होगा न तीरगी का असर



हम तो रहते हैं आप के दिल में

खुद का अपना नहीं है कोई घर



इस क़दर खो गया है होश-ओ-हवास

आजकल है न हमको अपनी ख़बर



मर्ज़ पहुँचा है उस मुक़ाम पे अब

हो गया खुद बिमार चाराग़र



नक़्श उसका बसा लिया दिल में

कौन मंदिर को जाए… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on June 6, 2016 at 9:32pm — 12 Comments

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