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Samar kabeer's Blog – June 2015 Archive (5)

एक ग़ज़ल ग़ालिब की ज़मीन में

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



एक मिसरे में इधर मैंने मेरा दिल बाँधा

दूसरे में तेरे रुख़्सार का ये तिल बाँधा



यूँ लगा जैसे हुवा सारा ज़माना रौशन

मैंने दौरान-ए-ग़ज़ल जब महे कामिल बाँधा



ख़ून आँखों से टपकता है तो हैरत कैसी

तूने क्यूँ कस के बदन से ये सलासिल बाँधा



मुनकशिफ़ हो गया दुनिया पे मेरा फ़न आख़िर

उसने साफ़ा मेरे सर पे सर-ए-महफ़िल बाँधा



उस से अल्फ़ाज़ की कुछ भीक थी दरकार मुझे

इस लिये मैंने मियाँ शैर…

Continue

Added by Samar kabeer on June 17, 2015 at 7:00pm — 31 Comments

ग़ज़ल :- आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

दैर कर दोगे तो हाथों से निकल जाऊँगा



एक हालत में यहाँ कौन रहा है,मैं भी

जैसे हर चीज़ बदलती है,बदल जाऊँगा



ऐसे ही बनते हैं,दुनिया में मिसाली किरदार

मैं भी फूलों की तरह काँटों में पल जाऊँगा



मोम या बर्फ़ के जैसा नहीं,पर जानता हूँ

मैं तिरे जिस्म की गर्मी से पिघल जाऊँगा



मैं तो इक ख़ाक का पुतला हूँ,तू मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद

पास आऊँगा अगर तेरे तो जल… Continue

Added by Samar kabeer on June 14, 2015 at 10:57am — 32 Comments

मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन/फ़ाइलान





मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं

हर दिल पे हो रहा है असर देखते नहीं



दीवाने अपने हाल से रहते हैं बेख़बर

किस सम्त हो रहा है सफ़र देखते नहीं



उर्यानियत के खेल इन्हें भी पसंद हैं

ख़ामोश हैं ये एहल-ए-नज़र देखते नहीं



वो देश हित की फ़िक्र में ग़लताँ हैं आज कल

ये और बात है कि इधर देखते नहीं



अंजान बन के पूछ रहे हो कि क्या हुवा

अख़बार में छपी है ख़बर देखते नहीं



कुछ देर… Continue

Added by Samar kabeer on June 8, 2015 at 11:09am — 36 Comments

ग़ज़ल :- तनाबें सब उखड़ गईं तुम्हारे एतबार की

मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन





तनाबें सब उखड़ गईं तुम्हारे एतबार की

हमें न अब सुनाइये कहानियाँ बहार की



फ़क़ीर की,न शाह की,न जोहरी ,सुनार की

यहाँ पे बात कर रहा हूँ मैं तो सिर्फ़ प्यार की



ज़रा सी देर बाद ये चराग़ बुझ ही जाएगा

हदें तमाम ख़त्म हो रही हैं इन्तिज़ार की



चढ़े दिमाग़ पर तो फिर कभी न वो उतर सके

मुझे तलाश है जनाब-ए-मन उसी ख़ुमार की



नदी किनारे झाड़ियों में छुप के बैठता है वो

सताए उसको भूक जब तलब लगे शिकार… Continue

Added by Samar kabeer on June 3, 2015 at 11:04pm — 25 Comments

कोई सुने तो बयाँ दिल का दर्द करता हूँ

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



मैं कैसे कर्ब से तकलीफ़ से गुज़रता हूँ

कोई सुने तो बयाँ दिल का दर्द करता हूँ



तमाम टैक्स चुकाता हूँ ज़िंदा रहने के

प शाईरी का अलग से लगान भरता हूँ



यही सबब है ,मुझे कम ही लोग जानते हैं

मैं इन फ़ुज़ूल की रुसवाईयों से डरता हूँ



अज़ल से आज तलक सिलसिला ये जारी है

मैं रोज़ जीता हूँ दुनिया में रोज़ मरता हूँ



यही तो है,मिरे फ़न का कमाल,देखो तो

जहाँ पे मिटते हैं सब लोग,मैं सँवरता हूँ



वो जिस… Continue

Added by Samar kabeer on June 1, 2015 at 11:00am — 29 Comments

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