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Naveen Mani Tripathi's Blog – June 2018 Archive (10)

तोड़ कर आप दिल अब किधर जाएंगे

212 212 212 212



आप जब आईने में सँवर जाएंगे ।

फिर तसव्वुर मेरे चाँद पर जाएंगे ।।1

गर इरादा हमारा सलामत रहा ।

तो सितारे जमीं पर उतर जायेंगे ।।2

आज महफ़िल में वो आएंगे बेनकाब ।

देखकर हुस्न को इक नज़र जाएंगे ।।3

आज मौसम हसीं ढल गयी शाम है ।

तोड़कर आप दिल अब किधर जाएंगे ।।4

कीजिये बेसबब और इनकार मत ।

हौसले और मेरे निखर जाएंगे ।।5

जानकर क्या करेंगे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 30, 2018 at 6:43pm — 12 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

गुल जो सूखा किताब में देखा ।

आपको फिर से ख़्वाब में देखा ।।

बारहा चाँद की नज़ाक़त को ।

झाँक कर वह नकाब में देखा ।।

मैकदे में गया हूँ जब भी मैं ।

तेरा चेहरा शराब में देखा ।।

वस्ल जब भी लगा मुनासिब तो।

कोई हड्डी कबाब में देखा ।।

तोड़ पाता उसे भला कैसे ।

हुस्न उसका गुलाब में देखा ।।

डाल कर फूल राह में सबके ।

मैंने पत्थर जबाब में देखा ।।

लुट गईं रोटियां गरीबों…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 26, 2018 at 9:43pm — 16 Comments

आपको तो दिल जलाना आ गया

2122 2122 212

जख्म  देकर  मुस्कुराना  आ   गया ।

आपको तो दिल जलाना आ गया ।।

काफिरों  की ख़्वाहिशें  तो  देखिये ।

मस्जिदों में सर झुकाना  आ गया ।।

दे गयी बस इल्म इतना मुफलिसी ।

दोस्तों  को  आजमाना  आ  गया ।।

एक  आवारा  सा  बादल  देखकर ।

आज मौसम आशिकाना आ गया ।।

क्या  उन्हें   तन्हाइयां  डसने  लगीं ।

बा अदब  वादा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 23, 2018 at 4:24pm — 19 Comments

दे गया दर्द कोई साथ निभाने वाला

2122 1122 1122 22

दे गया दर्द कोई साथ निभाने वाला ।

याद आएगा बहुत रूठ के जाने वाला ।।

जाने कैसा है हुनर ज़ख्म नया देता है ।

खूब शातिर है कोई तीर चलाने वाला ।।

उम्र पे ढल ही गयी मैकशी की बेताबी ।

अब तो मिलता ही नहीं पीने पिलाने वाला ।।

अब मुहब्बत पे यकीं कौन करेग़ा साहब ।

यार मिलता है यहां भूँख मिटाने वाला ।।

उसके चेहरे की ये खामोश अदा कहती है ।

कोई तूफ़ान बहुत जोर से आने वाला ।।

गम भी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 3:56am — 11 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

नाम दिल से तेरा हटा क्या है ।

पूछते लोग माजरा क्या है ।।

नफ़रतें और बेसबब दंगे ।

आपने मुल्क को दिया क्या है ।।

अब तो कुर्सी का जिक्र मत करिए ।

आपकी बात में रखा क्या है ।।

सब उमीदें उड़ीं हवाओं में ।

अब तलक आप से मिला क्या है ।।

है गुजारिश कि आज कहिये तो ।

आपके दिल में और क्या क्या है ।।

दिल की बस्ती तबाह कर डाली ।

क्या बताऊँ तेरी ख़ता क्या…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 18, 2018 at 12:22pm — 14 Comments

तुम्हारे जख्म सहलाये गये हैं

बहुत बेचैन वो पाये गए हैं ।

जिन्हें कुछ ख्वाब दिखलाये गये हैं ।।

यकीं सरकार पर जिसने किया था ।

वही मक़तल में अब लाये गए हैं।।

चुनावों का अजब मौसम है यारों ।

ख़ज़ाने फिर से खुलवाए गए हैं ।।

करप्शन पर नहीं ऊँगली उठाना ।

बहुत से लोग लोग उठवाए गये हैं ।।

तरक्की गांव में सड़कों पे देखी ।

फ़क़त गड्ढ़े ही भरवाए गये हैं ।।

पकौड़े बेच लेंगे खूब आलिम ।

नये व्यापार सिखलाये…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 11:04pm — 13 Comments

ग़ज़ल

कोई शिकवा गिला नहीं होता ।

तू अगर बावफ़ा नहीं होता ।।

रंग तुम भी बदल लिए होते ।

तो ज़माना ख़फ़ा नहीं होता ।।

आजमाकर तू देख ले उसको ।

हर कोई रहनुमा नहीं होता ।।

जिंदगी जश्न मान लेता तो ।

कोई लम्हा बुरा नहीं होता ।।

कुछ तो गफ़लत हुई है फिर तुझ से।

दूर इतना खुदा नहीं होता ।।

देख तुझको मिला सुकूँ मुझको ।

कैसे कह दूं नफ़ा नहीं होता ।।

दिल जलाने की बात छुप जाती ।

गर धुंआ कुछ उठा नहीं होता ।।

गर इशारा ही आप कर देते ।

मैं कसम…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 2:15pm — 11 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

जरूरत नहीं अब तेरी रहमतों की ।

हमें भी पता है डगर मंजिलों की ।।

है फ़ितरत हमारी बुलन्दी पे जाना ।

बहुत नींव गहरी यहाँ हौसलों की ।।

अदालत में अर्जी लगी थी हमारी ।

मग़र खो गयी इल्तिज़ा फैसलों की ।।

भटकती रहीं ख़्वाहिशें उम्र भर तक ।

दुआ कुछ रही इस तरह रहबरों की ।।

उन्हें जब हरम से मुहब्बत हुई तो ।

सदाएं बुलाती रहीं घुघरुओं की ।।

न उम्मीद रखिये वो गम बाँट लेंगे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 7, 2018 at 9:45pm — 14 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

लोग कब दिल से यहाँ बेहतर मिले ।

जब मिले तब फ़ासला रखकर मिले ।।

है अजब बस्ती अमीरों की यहां ।

हर मकाँ में लोग तो बेघर मिले ।।

तज्रिबा मुझको है सापों का बहुत ।

डस गये जो नाग सब झुककर मिले ।।

कर गए खारिज़ मेरी पहचान को ।

जो तसव्वुर में मुझे शबभर मिले ।।

मैं शराफ़त की डगर पर जब चला ।

हर कदम पर उम्र भर पत्थर मिले ।।

मौत से डरना मुनासिब है नहीं…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 6, 2018 at 3:38pm — 20 Comments

ग़ज़ल

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मुद्दतों के बाद उल्फ़त में इज़ाफ़त सी लगी

। आज फिर उसकी अदा मुझको इनायत सी लगी ।।

हुस्न में बसता है रब यह बात राहत सी लगी ।

आप पर ठहरी नज़र कुछ तो इबादत सी लगी ।।

क़त्ल का तंजीम से जारी हुआ फ़तवा मगर

। हौसलों से जिंदगी अब तक सलामत सी लगी ।।

बारहा लिखता रहा जो ख़त में सारी तुहमतें ।

उम्र भर की आशिक़ी उसको शिक़ायत सी लगी ।।

मुस्कुरा कर और फिर परदे में जाना आपका ।

बस यही हरकत…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 4, 2018 at 11:03pm — 8 Comments

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