आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को लिखने की कोशिश की है.
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शीर्षक: कारपोरेट कीबोर्ड
उंगलियाँ नाचती हैं…
मकाम पर नहीं, काली कुंजियों के मैदान…
ContinueAdded by आशीष यादव on April 20, 2026 at 12:31am — No Comments
Added by amita tiwari on April 14, 2026 at 7:30pm — 3 Comments
Added by vijay nikore on April 14, 2026 at 8:19am — 1 Comment
Added by Sushil Sarna on April 6, 2026 at 12:48pm — 3 Comments
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