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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – April 2021 Archive (6)

मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२



किसलिए भण्डार अपने भर रहे हो

देश बेबस को  निवाला  कर रहे हो।१।

*

रंग पोते धर्म  का  बाहर से अपने

आप केवल पाप के ही घर रहे हो।२।

*

निर्वसनता  चन्द  लोगों  को सुहाती

इसलिए क्या चीर सब का हर रहे हो।३।

*

कत्ल का आदेश तुमने ही दिया जब

खून के छींटों से क्योंकर  डर रहे हो।४।

*

व्यर्थ है  उम्मीद  पिघलोगे  कभी ये

है पता  हर  जन्म  में  पत्थर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2021 at 5:40am — 6 Comments

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की- लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

चिन्ता करें जो आम की शासन नहीं रहे

कारण इसी के लाखों के जीवन नहीं रहे।१।

*

हर कोई खेल सकता है पैसों के जोर पर

कानून  आज  देश  में  बन्धन  नहीं  रहे।२।

*

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की

जो थे  बचाते  लाज  को  यौवन नहीं रहे।३।

*

आई हवा नगर की  तो दीवारें बन गयीं

मिलजुल जहाँ थे बैठते आगन नहीं रहे।४।

*

जीवन का दर्द आँखों में उनकी रहा जवाँ

बेवा हो जिनके  हाथों  में  कंगन नहीं रहे।५।

*

तकनीक…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 12:48pm — 4 Comments

कालिख लगी है इनमें जो -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने किसी को हर्ष का इक पल नहीं दिया

सूखी धरा को  जैसे  कि  बादल  नहीं दिया।१।

*

रूठे तो उससे रोज ही लेकिन मनाया कब

आँसू ढले जो आँखों से आँचल नहीं दिया।२।

*

गंगा से  भर  के  लाये  थे  पुरखों  को तारने

जलते वनों की प्यास को वो जल नहीं दिया।३।

*

कहने पे मन को आपके बंदिश में क्यों रखें

यूँ जब किसी भी द्वार को साँकल नहीं दिया।४।

*

कालिख लगी है इनमें जो सौगात जग की है

आँखों में हम ने एक  भी  काजल नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 25, 2021 at 12:36pm — 6 Comments

कौन आया काम जनता के लिए- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



कौन आया काम जनता के लिए

कह गये सब राम जनता के लिए।१।

*

सुख सभी रखते हैं नेता पास में

हैं वहीं दुख आम जनता के लिए।२।

*

देख पाती है नहीं मुख सोच कर

बस बदलते नाम जनता के लिए।३।

*

छाँव नेताओं  के हिस्से हो गयी

और तपता घाम जनता के लिए।४।

*

अच्छे वादे और बोतल वोट को

हो गये तय दाम जनता के लिए।५।

*

न्याय के पलड़े में समता है कहाँ

भोर नेता  साम …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 8, 2021 at 10:01pm — 3 Comments

हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया

बोली जवानी क्रोध  में दुश्मन क्या लिख दिया।१।

*

घर के बड़े  भी  काट  के  पेड़ों  को  खुश हुए

बच्चों ने चौड़ा चाहिए आँगन क्या लिख दिया।२।

*

तस्कर तमाम  आ  गये  गुपचुप  से  मोल को

माटी को यार देश की चन्दन क्या लिख दिया।३।

*

आँखों से उस की धार  ये  रुकती नहीं है अब 

भाता है जब से आपने सावन क्या लिख दिया।४।

*

वो  सब  विहीन  रीड़  के  श्वानों  से  बन …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 1:00pm — 10 Comments

गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



सादगी से  घर  सँभाला कीजिए

लालसा को मत उछाला कीजिए।१।

*

यह धरा  तो  रौंद  डाली  जालिमों

चाँद का मुँह अब न काला कीजिए।२।

*

करके सूरज से उधारी आब की

चाँद से कहते उजाला कीजिए।३।

*

जब नया देने की कुव्वत ही नहीं

मत फटे में  पाँव  डाला कीजिए।४।

*

गर तबीयत  जाननी  है  देश की

सबसे पहले ठीक आला कीजिए।५।

*

चाँद तारे सिर्फ महलों को न दो

झोपड़ी में भी उजाला कीजिए।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 6, 2021 at 6:30pm — 4 Comments

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