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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – April 2019 Archive (10)

ये पब्लिक है? (लघुकथा)

"सच कहूं! मुझे भी पता नहीं था कि मेरी अग्नि से मिट्टी के आधुनिक चूल्हे पर चढ़ी एक साथ चार हांडियों में मनचाही चीज़ें एक साथ पकाई जा सकती हैं!"



"तो तुम्हारा मतलब हमारे मुल्क की मिट्टी में आज़ादी के चूल्हे पर लोकतंत्र के चारों स्तंभों की हांडियां एक साथ चढ़ा कर मनचाही सत्ता चलाने से है ... है न?"



"तो तुम समझ ही गये कि इस नई सदी में तुम्हारे मुल्क में मेरी ही आग कारगर है; फ़िर तुम इसे चाहे जो नाम दो : धर्मांधता, तानाशाही, सामंतवाद, भ्रष्टाचार, भय या तथाकथित हिंदुत्व…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 28, 2019 at 9:36am — 2 Comments

लड़की (लघुकथा)

अम्मा को चारपाई पर लेटे देख बिटिया किशोरी भी उसके बगल में लेट गई और दोनों हाथों से उसे घेर कर कसकर सीने से लगाकर चुम्बनों से अपना स्नेह बरसाने लगी। इस नये से व्यवहार से अम्मा हैरान हो गई। उसने अपनी दोनों हथेलियों से बिटिया का चेहरा थामा और फ़िर उसकी नम आंखों को देख कर चौंक गई। कुछ कहती, उसके पहले ही बिटिया ने कहा :



"अम्मा तुम ज़मीन पे चटाई पे लेट जाओ!"



जैसे ही वह लेटी, किशोरी अपनी अम्मा के पैर वैसे ही दाबने लगी, जैसे अम्मा अपने मज़दूर पति के अक्सर दाबा करती…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 23, 2019 at 6:19pm — 4 Comments

"ओ आली, कौन अली; कौन महाबली?" (लघुकथा) :

छकपक ... छकपक ... करती आधुनिक रेलगाड़ी बेहद द्रुत गति से पुल पर से गुजर रही थी। नीचे शौच से फ़ारिग़ हो रहे तीन प्रौढ़ झुग्गीवासी बारी-बारी से लयबद्ध सुर में बोले :



पहला :



"रेल चली भई रेल चली; पेल चली उई पेल चली!"



दूसरा :



"खेल गई रे खेल गई; खेतन खों तो लील गई!"



फ़िर तीसरा बोला :



"ठेल चली; हा! ठेल चली; बहुतन खों तो भूल चली!"



दूर खड़े अधनंगे मासूम तालियां नहीं बजा रहे थे; एक-दूसरे की फटी बनियान पीछे से पकड़ कर छुक-छुक…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 22, 2019 at 3:32pm — 2 Comments

आम चुनाव और समसामायिक संवाद (लघुकथाएं) :

(1).चेतना :



ग़ुलामी ने आज़ादी से कहा, "मतदाता सो रहा है, उदासीन है या पार्टी-प्रत्याशी चयन संबंधी किसी उलझन में है, उसे यूं बार-बार मत चेताओ; हो सकता है वह अपने मुल्क में किसी ख़ास प्रभुत्व या किसी तथाकथित हिंदुत्व या किसी इमरजैंसी के ख़्वाब बुन रहा हो!"

आज़ादी ने उसे जवाब दिया, "नहीं! हमारे मुल्क का मतदाता न तो सो रहा है; न ही उदासीन है और न ही किसी उलझन में है! उसे चेताते रहना ज़रूरी है! हो सकता है कि वह तुष्टीकरण वाली सुविधाओं, योजनाओं, क़ानूनों से आज़ादी का मतलब भूल गया हो या…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 21, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

तूलिकायें (लघुकथा) :

नयी सदी अपना एक चौथाई हिस्सा पूरा करने जा रही थी। तेज़ी से बदलती दुनिया के साथ मुल्क का लोकतंत्र भी मज़बूत होते हुए भी अच्छे-बुरे रंगों से सराबोर हो रहा था। काग़ज़ों और भाषणों में भले ही लोकतंत्र को परिपक्व कहा गया हो, लेकिन लोकतंत्र के महापर्व 'आम-चुनावों' के दौरान राजनीतिक बड़बोलेपन के दौर में यह भी कहा जा रहा था कि अमुक धर्म ख़तरे में है या अपना लोकतंत्र ही नहीं, मुल्क का नक्शा भी ख़तरे में है! कोई किसी बड़े नेता, साधु-संत, उद्योगपति, धर्म-गुरु या देशभक्त को चौड़ी छाती वाला इकलौता 'शेर' कह रहा था,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 16, 2019 at 5:30pm — 5 Comments

विवशतायें (लघुकथा) :

बहाव को रोकने के लिये किसी भी प्रकार के बंध या बंधन काम नहीं आ पा रहे थे। तेज बहाव के बीच एक टीले पर कुछ नौजवान अपनी-अपनी क्षमता और सोच अनुसार विभिन्न पोशाकें पहने, विभिन्न स्मार्ट फ़ोन, कैमरे और दूरबीनें लिए हुए बहती तेज धाराओं के थमने या थमाये जाने; बचाव दल के आने या बुलवाये जाने; नेताओं, मंत्री, यंत्री, धर्म-गुरुओं अथवा विशेषज्ञों के दख़ल करने या करवाने के भरोसे, प्रतीक्षा और शंका-कुशंकाओं के साथ माथापच्ची करते हुए एक-दूसरे के हाथ थामे खड़े हुए थे। कोई तटों की ओर देख रहा था, तो कोई आसमां की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 15, 2019 at 9:31pm — 6 Comments

डाटा रिकवरी! (लघुकथा) :

कई दिनों से टल रहा काम निबटा कर, थके-हारे मिर्ज़ा मासाब अपने अज़ीज़ दोस्त पंडित जी के साथ अपने घर वापस पहुंचे। अपनी नाराज़ बेगम साहिबा को कुछ इस अंदाज़ में देखने लगे कि बेगम का ग़ुस्सा फ़ुर्र से उड़ गया!



"क्या बात है पंडित जी! आज ये हमें इस तरह क्यूँ घूर रहे हैं!" कुछ शरमा कर मुस्कराते हुए बेगम ने अपने पल्लू की आड़ लेकर कहा।



"डाटा रिकवरी करवा कर आये हैं मिर्ज़ा जी के लेपटॉप की!" पंडित जी ने दोस्त का कंधा दबाते हुए कहा।



"अच्छा! वो तो बहुत बढ़िया किया आपने। बहुत…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2019 at 11:30pm — 5 Comments

'आह क्या सीन है!' (लघुकथा) :

कई दिनों देश-विदेश यात्राएं कर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों और परिदृश्यों की साक्षी होने के बाद एक मशहूर पुस्तकालय का मुआयना करते हुए उन दोनों ने अपनी लम्बी चुप्पी यूं तोड़ ही दी :



"यह भी सभ्य लोगों का ही एक अड्डा है!"



"बाहर से इंसान कुछ भी दिखे, अंदर से तो प्राय: उसका चरित्र भद्दा है!" सभ्यता की बात पर असभ्यता ने कहा।



"संक्रमण-काल है! वैश्वीकरण में मिलावट का दौर है! स्वार्थी तकनीकी तरक़्क़ी का मुद्दा है!" एक आह भरते हुए सभ्यता ने कहा और पुस्तकालय में सलीके से…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2019 at 9:23pm — 7 Comments

"फ़ेम्अलि वाली सेल्फ़ी" (कविता) :

सेल्फ़ी-स्टिक से ले डाली रे, कुल्फ़ी वाली सेल्फ़ी।
हेल्द़ी-स्टिक दो खा डालीं रे, हम सब दिखते हेल्द़ी।।

मम्मी-पापा को भी लाओ, सेल्फ़ी लेंगी मम्मी।
कुल्फ़ी सब जी भर के खाओ, मम्मी वाली कुल्फ़ी।।

सर्दी-ज़ुकाम से क्या डरना, गर्मी वाली सर्दी।
ज़ल्दी से अब और खिलादो, ठंडी कुल्फ़ी ज़ल्दी।।

सेल्फ़ी-स्टिक से ले डाली रे, मस्ती वाली सेल्फ़ी।
ले ली दादा-दादी वाली, सेल्फ़ी सुंदर ले ली।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

लो आ गईं छुट्टियां! (संस्मरण) :

लो फिर से गर्मियों की छुट्टियां आ गईं। दो महीने पहले से परिवारजन और बच्चे इन छुट्टियों के सही व नये इस्तेमाल के बारे में अपनी-अपनी राय दे रहे थे। बच्चों की योजनाओं पर बड़ों की व्यस्तताओं और योजनाओं के कारण बच्चों के मन के फैसले नहीं हो पा रहे थे। आम चुनावों का भी माहौल चल रहा था। किसी के मम्मी-पापा किसी ज़िम्मेदारी में फंसे थे, तो किसी के किसी और काम में। बहरहाल इन छुट्टियों के एक-एक दिन का सही इस्तेमाल होना बहुत ज़रूरी था।

मुझे फुरसत देख घर के और पड़ोस के बच्चों ने मुझे यह…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 7, 2019 at 10:34am — 3 Comments

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