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Featured Blog Posts – April 2014 Archive (8)

ग़ज़ल !!

इधर-उधर की न कर, बात दिल की कर साक़ी

सुहानी रात हुआ करती मुख़्तसर साक़ी ||

खिला-खिला है हर इक फूल दिल के सहरा में

तुम्हारे इश्क़ का कुछ यूँ हुआ असर साक़ी ||

अजीब दर्दे-मुहब्बत है ये शकर जैसा

जले-बुझे जो सितारों सा रातभर साक़ी ||

उतार फेंक हया शर्म के सभी गहने

कि रिस न जाए ये शब, हो न फिर सहर साक़ी ||

है बरकरार तेरा लम्स* मेरे होंठों पर

कि जैसे ओंस की इक बूँद फूल पर साक़ी ||

ख़ुदा से और न दरख़ास्त एक…

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Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 30, 2014 at 11:00pm — 21 Comments

नन्हीं सी चिनगारी

निष्प्राण कभी लगता

जीवन

निर्मम समय-प्रहारों से

सूख-बिखरते,बू खोते

सुरभित पुष्प अतीत के.

निश्चेत 'आज' भी होता

भावी शीतल-शुष्क

हवाओं की आहट पाने को.

फिर भी कुछ अंश

जिजीविषा के रहते

गतिमान रखें जो तन को

निरा यंत्र-सा.

जो हेतु बने

दाव,हवन,होलिका के

या अस्तित्व मिटाती

झंझावर्तों में

चिनगारी...

वही एक नन्हीं सी.

द्युतिमान रहूँ मैं भी

हों तूफान,थपेड़े

या…

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Added by Vindu Babu on April 30, 2014 at 10:30pm — 30 Comments

रावनो को लक्ष्मनी रेखा नहीं

२१२२ २१२२ २१२


है वतन में कोई भी भूखा नहीं !
लगता है पूरा वतन देखा नहीं

रोटियाँ हाथों में ले रोते रहे
कह रहे थे क्यूँ मिला चोखा नहीं

जुल्म के बाजार कितने भी फलें
रावनो को लक्ष्मनी रेखा नहीं

फूटते ही हैं नहीं घाट पाप के अब
पाप-पुण्यों का कोई लेखा नहीं

फट गयी धरती वहां पर प्यास से
पर यहाँ इक बूँद भी सोखा नहीं

सब हमें छलते रहे हैं रात-दिन
सोचते आशू कहाँ धोखा नहीं


मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Mishra on April 30, 2014 at 11:19am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
संदेसा भेज दे ,कान्हा को कोई ----(कुडंली छंद)

कुडंली छंद 



छंद-लक्षण: जाति त्रैलोक लोक , प्रति चरण मात्रा २१ मात्रा, चरणांत गुरु गुरु (यगण, मगण), यति ११-१०।

अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती,

राधा पग-पग फिरे,विरह बीज बोती|

सोच रही काश मैं ,कान्हा  सँग होती,

चूम-चूम बाँसुरी,अँसुवन से धोती|

 

मथुरा पँहुचे सखी ,भूले कन्हाई,  

वृन्दावन नम हुआ ,पसरी तन्हाई|

मुरझाई देखता ,बगिया का माली,

तक-तक राह जमुना ,भई बहुत काली|

 

 खग,मृग, अम्बर, धरा,हँसना सब…

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Added by rajesh kumari on April 30, 2014 at 11:00am — 31 Comments

नायक (अरुण श्री)

अपनी कविताओं में एक नायक रचा मैंने !

समूह गीत की मुख्य पंक्ति सा उबाऊ था उसका बचपन ,

जो बार-बार गाई गई हो असमान,असंतुलित स्वरों में एक साथ !

तब मैंने बिना काँटों वाले फूल रोपे उसके ह्रदय में ,

और वो खुद सीख गया कि गंध को सींचते कैसे हैं !

उसकी आँखों को स्वप्न मिले , पैरों को स्वतंत्रता मिली !

लेकिन उसने यात्रा समझा अपने पलायन को !

उसे भ्रम था -

कि उसकी अलौकिक प्यास किसी आकाशीय स्त्रोत को प्राप्त हुई है !

हालाँकि उसे ज्ञात था…

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Added by Arun Sri on April 28, 2014 at 11:00am — 27 Comments

आदमी (प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा )

आदमी 

---------------

ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं

बौने लोग

विकृति और स्वभाव

एक दूजे के

पर्यायवाची

चाहरदीवारी के मध्य

शून्य…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 20, 2014 at 6:41pm — 34 Comments

माँ के हाथों सूखी रोटी का मजा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122         212

आँसुओं को यूँ  मिलाकर  नीर में

ज्यों  दवा  हो  पी  रहा हूँ  पीर में

**

हाथ की रेखा  मिटाकर चल दिया

क्या लिखा है क्या कहूँ तकदीर में

**

कौन  डरता   जाँ  गवाने  के  लिए

रख जहर जितना हो रखना तीर में

**

हर तरफ उसके  दुशासन डर गया

मैं न था कान्हा  जो बधता चीर में

**

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में

**

शायरी  कहता  रहा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 17, 2014 at 10:30am — 15 Comments

ग़ज़ल : तुम्हारे लिए जश्न हाेगा ये मेला

सभी रास्ताें पर सिपाही खटे हैं 

ताे फिर लाेग क्याें रास्ते से हटे हैं । 

सियासत अाै मज़हब की दीवारें देखाे 

दीवाराें से ही लाेग गुमसुम सटे हैं । 

सरहद है सराें के लिए अाखरी हद 

अकारण यहाँ पर कई सर कटे हैं…

Continue

Added by Krishnasingh Pela on April 13, 2014 at 12:00pm — 27 Comments

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