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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – March 2014 Archive (4)

बहाकर अश्क भी यारो - ग़ज़ल

1222    1222     1222     1222

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सिखाते  क्यों  हमें  हो  तुम वही इतिहास की बातें

दिलों में  घोलकर  नफरत  नये  विश्वास  की बातें

*

बताओ  घर   बनेगा  क्या  हमारा   आसमानों  में

जमीनें  छीन   के   करते  सदा  आवास  की  बातें

*

कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा

बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें

*

बहाकर  अश्क  भी  यारो  कहाँ  दुख  दूर  होते हैं

गमों  से  पार  पाने  को  करो   परिहास  की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 29, 2014 at 7:30am — 29 Comments

चादरें छोटी मिली हैं किश्मतों की-ग़ज़ल

2122    2122    2122  

***

आदमी  को  आदमी  से  बैर  इतना

भर रहा अब खुद में ही वो मैर इतना

*

दुश्मनो  की  बात  करनी व्यर्थ है यूँ

अब  सहोदर  ही  लगे  है गैर इतना

*

चादरें  छोटी  मिली हैं  किश्मतों की

इसलिए भी मत  पसारो  पैर इतना

*

दे रहे  आवाज  हम  हैं  बेखबर  तुम

कर  रहे  हो किस  जहाँ  में सैर  इतना

*

किस तरह आऊं बता तुझ तक अभी मैं

गाव! उलझन  दे  गया  है  नैर  इतना

*

झूठ  होते  हैं  सियासत  के …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2014 at 8:30am — 20 Comments

सिखाता रावणों के गुर - ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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किया माथे तिलक झट से कहा नाकाम भी मुझको

बहुत  ठोका  लुहारों  सा  दिया आराम  भी मुझको

*

गिरा तो भी  समझ मेरी  न आयी  शातिरी उसकी

बिठाया  पास  भी अपने किया बदनाम भी मुझको

*

पता  है  साथ  उसके तो  न आया  था कभी  सूरज

जलाता क्यो न जाने फिर शरद का घाम भी मुझको

*

हसाता  चोट  देकर  भी  बड़ा  जालिम  खुदा  पाया

रूला  देता  न मरने  का सुना  पैगाम  भी  मुझको

*

अजब सी रहमतें  उसकी  अजब ही  सब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2014 at 6:30am — 14 Comments

गरल रख पास शिव जैसा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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हमारे   दुख  दिखाई  कब  दिए  हैं  देवताओं को

हमेशा  आँकते वो   कम  हमारी  आपदाओं  को

*

मरें  या  जी रहे  हों हम  उन्हें  पूजा  करें  हरदम

न जब भी पूज पाए हम निकल आए सजाओं को

*

नहीं फिर भी हुए खुश वो भले ही सब किया अर्पण

गरल रख पास शिव जैसा सदा सौपा सुधाओं को

*

पुकारा  जब  गया  उनको  दुखों से  हो  परेशा ढब

किया है  अनसुना बरबस  हमारी सब सदाओं को

*

लगा करता जरूरी नित न जाने क्यों उन्हे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2014 at 11:30am — 17 Comments

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