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चादरें छोटी मिली हैं किश्मतों की-ग़ज़ल

2122    2122    2122  

***
आदमी  को  आदमी  से  बैर  इतना
भर रहा अब खुद में ही वो मैर इतना

*
दुश्मनो  की  बात  करनी व्यर्थ है यूँ
अब  सहोदर  ही  लगे  है गैर इतना

*
चादरें  छोटी  मिली हैं  किश्मतों की
इसलिए भी मत  पसारो  पैर इतना

*
दे रहे  आवाज  हम  हैं  बेखबर  तुम
कर  रहे  हो किस  जहाँ  में सैर  इतना

*
किस तरह आऊं बता तुझ तक अभी मैं
गाव! उलझन  दे  गया  है  नैर  इतना

*
झूठ  होते  हैं  सियासत  के  ये  वादे
इन  भरोसे  मत  हवा  में तैर इतना

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

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Comment

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Comment by भुवन निस्तेज on March 31, 2014 at 8:23am

Sabhi sher khas hai par makte ki bat to kya kariye

झूठ  होते  हैं  सियासत  के  ये  वादे
इन  भरोसे  मत  हवा  में तैर इतना

Aur ye sher to hasil-e- gazal thahre shayad...

चादरें  छोटी  मिली हैं  किश्मतों की
इसलिए भी मत  पसारो  पैर इतना

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 29, 2014 at 6:52am

आदरणीय भाई सौरभ जी , दाद देने के लिए हार्दिक आभार .आपके दो शब्द निरंतर बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करते हैं .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 11:44pm

इस ग़ज़ल के लिए दाद कुबूल करें,भाईजी.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 27, 2014 at 10:44am

आदरणीय भाई ओमप्रकाश जी ग़ज़ल कि प्रसंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 27, 2014 at 10:44am

आदरणीय भाई गिरिराज  जी ग़ज़ल कि प्रसंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 27, 2014 at 10:43am

आदरणीय भाई विजय  जी ग़ज़ल कि प्रसंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 27, 2014 at 10:42am

आदरणीय सरिता जी ग़ज़ल कि प्रसंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 27, 2014 at 10:40am

आदरणीय जितेंद्र भाई ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए आभार.

Comment by Omprakash Kshatriya on March 26, 2014 at 8:40pm
चादरें छोटी मिली हैं किश्मतों की
इसलिए भी मत पसारो पैर इतना...........................बधाई .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2014 at 6:07pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये आपको बहुत बधाइयाँ ॥

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