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सिखाता रावणों के गुर - ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222

किया माथे तिलक झट से कहा नाकाम भी मुझको
बहुत  ठोका  लुहारों  सा  दिया आराम  भी मुझको

*
गिरा तो भी  समझ मेरी  न आयी  शातिरी उसकी
बिठाया  पास  भी अपने किया बदनाम भी मुझको

*
पता  है  साथ  उसके तो  न आया  था कभी  सूरज
जलाता क्यो न जाने फिर शरद का घाम भी मुझको

*
हसाता  चोट  देकर  भी  बड़ा  जालिम  खुदा  पाया
रूला  देता  न मरने  का सुना  पैगाम  भी  मुझको

*
अजब सी रहमतें  उसकी  अजब ही  सब सजाएं हैं
न रखता भोर  के काबिल न  देता शाम भी मुझको

*
बनाना चाहता  है क्या ‘मुसाफिर ’ मैं न समझा ये
सिखाता  रावणों  के  गुर  पुकारे  राम  भी  मुझको


मौलिक व अप्रकाशित

Views: 678

Comment

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Comment by भुवन निस्तेज on March 31, 2014 at 8:32am

kaafi khubsurat andaz-e-bayan hai sahab...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 27, 2014 at 7:51pm

बहुत शान्दार कंट्रास्ट निबाहने की कोशिश हुई है, आदरणीय लक्ष्मण भाई. बधाई स्वीकार करें.

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 26, 2014 at 9:27pm

बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है... ये शैली बहुत पसंद आयी 

सभी अशआर पसंद आये 

हार्दिक बधाई 

Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 1:09am

अशआर में जो कंट्रास्ट पैदा किया गया है लुत्फ़ को कई गुना बढ़ा रहा है ... भी मुझको रदीफ़ अपना कमाल दिखा रही है

हर शेर पर ढेरो दाद

Comment by annapurna bajpai on March 23, 2014 at 12:39am

सुंदर गजल बहुत बधाई आपको । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 22, 2014 at 2:02pm

बहुत बढ़िया लक्ष्मण जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 22, 2014 at 8:54am

गिरा तो भी  समझ मेरी  न आयी  शातिरी उसकी
बिठाया  पास  भी अपने किया बदनाम भी मुझको.............. यह शेर दिल को छू गया

हार्दिक बधाई आपको आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by Omprakash Kshatriya on March 22, 2014 at 7:08am

बनाना चाहता है क्या ‘मुसाफिर ’ मैं न समझा ये
सिखाता रावणों के गुर पुकारे राम भी मुझको............... बढ़िया .................. बधाई .

Comment by Sarita Bhatia on March 21, 2014 at 8:41pm

आदरणीय अच्छी गजल के लिए बधाई 

नादिर भाई के कहे का संज्ञान कीजिये 

Comment by नादिर ख़ान on March 20, 2014 at 9:59pm

हसाता  चोट  देकर  भी  बड़ा  जालिम  खुदा  पाया
रूला  देता  न मरने  का सुना  पैगाम  भी  मुझको..........??????

आदरणीय लक्ष्मण जी कुछ अस्पष्ट सा लग रहा है 

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