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December 2013 Blog Posts

इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

अन्धकार

मौन हवाएं

सर्द गर्म और सीली सीली

आते जाते

आम जनों की

तबियत ढीली  

सन्नाटों की चीख

अनवरत अनुशासित है

लेन देन की बात करे हैं

सारे उल्लू

चन्दा का उजियारा

ढूँढे

जल भर चुल्लू

भूतों और पिशाचों से

बस ये शासित है

दहशत वहशत

खुली सड़क पर

खुल के झूमें

डाकू और लुटेरे

क्षण क्षण

दामन चूमें

शबनम का कतरा

त्रण त्रण में आभासित…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 8:00pm — 13 Comments

***बुजुर्ग को सुनाते हैं …..***

बुजुर्ग को सुनाते हैं …..



हाँ

मानता हूँ

मेरा जिस्म धीरे धीरे

अस्त होते सूरज की तरह

अपना अस्तित्व खोने लगा है

मेरी आँखों की रोशनी भी

धीरे धीरे कम हो रही है

अब कंपकपाते हाथों में

चाय का कप भी थरथराता है

जिनको मैं अपने कंधों पर

उठा कर सबसे मिलवाने में

फक्र महसूस करता था

वही अब मुझे किसी से मिलवाने में

परहेज़ करते हैं

शायद मैं बुजुर्ग

नहीं नहीं बूढा बुजुर्ग हो गया हूँ

मैं अब वक्त बेवक्त की चीज़ हो गया हूँ…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 1, 2013 at 6:12pm — 20 Comments

मेरा मन झूम राधा हो : अरुन शर्मा 'अनन्त'

भलाई का इरादा हो,
परस्पर प्रेम आधा हो,

मुरारी की सुनूँ मुरली,
मेरा मन झूम राधा हो,

लबालब प्रेम से हो जग,
गली घरद्वार वृंदा हो,

यही मैं चाहता हूँ रब,
मेरी चाहत चुनिन्दा हो,

ह्रदय में प्रेम उपजे औ,
मधुर सम्बन्ध जिन्दा हो,

खुले आकाश के नीचे,
सदा निर्भय परिन्दा हो,

बसे इंसानियत दिल में,
मरा भीतर दरिन्दा हो....

मौलिक व अप्रकाशित ..

Added by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 3:30pm — 28 Comments

माँ की बेटी को सलाह [ दोहावली ]

लक्ष्मी है तू गेह की, तू मेरा सम्मान
सबको देना मान तू ,भाई पिता समान /


बेटी है तो क्या हुआ तू है घर की लाज
हमारा तू गुरूर है, मेरी तू आवाज /


बनना मत तू दामिनी,सहकर अत्याचार
लेना दुर्गा रूप तू ,करना तू संहार /

मत घबराना तू कभी, जो हो जग बेदर्द
तू है दुर्गा कालिका ,मत सहना तू दर्द /


जिसका तुझसे हो भला,उसके आना काम
अबला नारी जो दिखे ,उसको लेना थाम /

..............मौलिक व अप्रकाशित .......

Added by Sarita Bhatia on December 1, 2013 at 11:30am — 14 Comments

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