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जोन्ही भर के जोर पर, चिहुँकल छनकि अन्हार
ढिबरी भर के आस ले, मनवाँ सबुर सम्हार

रहि-रहि मन अकुतात बा, दुअरा लखन-लकीर 
सीता सहमसु चूल्हि पर, बाया-बाया पीर

दर-दर भटकसु रामजी, रावन बड़हन पेट
चहुँप अजोध्या जानकी, भइली मटियामेट

तुलसी देई पूरि दऽ, भाखल अतने बात
बंस-बाँस के सोरि पर, कसहूँ नति हो घात

हमरो राजाराम के, लछमन भइले लाल
अँगना-दुअरा-खेत पर, सहमत लागो चाल

*********************************************

(मौलिक व अप्रकाशित)

शब्दन के भावार्थ -

[जोन्ही - सितारे ; चिहुँकल - चौंकना ; छनकि - चट् से, छिनक कर ; अन्हार - अँधेरा ; सबुर - धीरज ; अकुताना - चंचल होना ; दुअरा - द्वार पर ; लखन-लकीर - लक्ष्मण-रेखा ; सहमसु - सहमती हैं ; चूल्हि - चूल्हा ; बाया-बाया - रोम-रोम ; पीर - दर्द, पीड़ा ; बड़हन - बहुत बड़ा ; चहुँप - पहुँच ; देई - देवी ; पूरि दऽ - पूरा कर दो ; भाखल -  भाखा हुआ, मनता माना हुआ ; अतने - इतना ही ; सोरि - जड़, मूल ; नति हो - मत हो ; घात - षड्यंत्र, आघात ; सहमत लागो चाल - मतैक्यता बनी रहे ]

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Replies to This Discussion

आदरणीय सौरभ जी बहुतइ नीक लागल ...
भोजपुरी की मिठास मन में घर कर गयी ..देशज भाषा ऐसे ही बचायी जाए तो आनंद और आये सुन्दर रचना ..चहुंप ...देई..पूरि द सुन बहुत अच्छा लगा ...छठ पर आप की रचना का इन्तजार होगा
आभार
भ्रमर ५

आपका सादर धन्यवाद, आदरणीय सुरेंद्र भ्रमरजी. 

आपको मेरे भोजपुरी दोहे रुचिकर लगे यह मेरे लिएभी संतोष की बात है. रचनाकर्म सकर्मक हुआ.

सादर

कई बेर इ दोहन के पढ़ चुकल बानी आजू फेरु निमन से एहमे डुबनी आ उतरईईनी ह, हर बेरु ओतने निक लागत बा, शब्द शब्द मे जेवन माटी के खाटी महक बा उ वोइसने लागत बा जैइसे खूब घाम से तपल धरती प बरखा होखला प महकेला |
बहुते निक लागल ई प्रस्तुति, बहुत बहुत बधाई और शुभकामना बावे |
सादर |

//माटी के खाटी महक बा, उ वोइसने लागत बा जइसे खूब घाम से तपल धरती प बरखा होखला प महकेला//

ओह ! अद्भुत उपमा ! निकहा खाँटी !

करेड़ तातल माटी पर परत बुनी से उमगल सोन्ह सुबास के नरम-नरम झोंका सउँसे छाती में भरि गइल !

दोहन के रुचला के निकहा हिरदा से धन्यवाद..

वाह वाह वाह...बहुत मजा आया...क्या कहने आ. सौरभ पाण्डेय जी...

रहि-रहि मन अकुतात बा, दुअरा लखन-लकीर  
सीता सहमसु चूल्हि पर, बाया-बाया पीर ......................बड़ा निक लागल...ई दोहा...राउर बहुते आभारी बानी....नमन...!!!!!!

दर-दर भटकसु रामजी, रावन बड़हन पेट 
चहुँप अजोध्या जानकी, भइली मटियामेट 

तुलसी देई पूरि दऽ, भाखल अतने बात 
बंस-बाँस के सोरि पर, कसहूँ नति हो घात //

भोजपुरी मिठास लिहले बहुते सुन्दर रचना | बधाई रउआ  के | सादर 

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