For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ओबीओ ’चित्र से काव्य तक’ छंदोत्सव" अंक- 73 की समस्त रचनाएँ चिह्नित

सु्धीजनो !

दिनांक 20 मई 2017 को सम्पन्न हुए "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक - 73 की समस्त प्रविष्टियाँ 
संकलित कर ली गयी हैं.


इस बार प्रस्तुतियों के लिए दो छन्दों का चयन किया गया था, वे थे -

सार छन्द और कुण्डलिया छन्द.


वैधानिक रूप से अशुद्ध पदों को लाल रंग से तथा अक्षरी (हिज्जे) अथवा व्याकरण के अनुसार अशुद्ध पद को हरे रंग से चिह्नित किया गया है.

यथासम्भव ध्यान रखा गया है कि इस आयोजन के सभी प्रतिभागियों की समस्त रचनाएँ प्रस्तुत हो सकें. फिर भी भूलवश किन्हीं प्रतिभागी की कोई रचना संकलित होने से रह गयी हो, वह अवश्य सूचित करे.

सादर
सौरभ पाण्डेय
संचालक - ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव, ओबीओ

*******************************************

१. आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी
कुंडलिया [ प्रथम प्रस्तुति] 

चंदू हूँ मैं प्रौढ़ भी, मारो नहीं हुजूर।

परम भक्त हनुमान का, छेड़ छाड़ से दूर॥

छेड़ छाड़ से दूर, रोमियो मुझे न कहना।

चप्पल यूँ ना तान, बंधु मैं तेरा बहना॥

ब्रेक हो गया फेल, न समझो मुझको मंदू।

सिर पर आधा चाँद ,करो मत पूरा चंदू॥............... (संशोधित)

 

सार छंद

पाँव पड़ूँ मैं घूँघट वाली, दोष नहीं पर मेरा

आँचल  मुझसे लिपट गया तो छाया घना अँधेरा

 

सही समय पर ब्रेक लगाया, सत्य वचन कहता हूँ।

हाथ जोड़ मैं शीश झुकाऊँ, चप्पल से डरता हूँ॥

मैं बूढ़ा बदमाश नहीं हूँ, मार मुझे ना माई।

तू मेरी प्यारी बहना मैं, तेरा चंदू भाई॥

तीन रंग ट्रैफिक सिग्नल सी, साड़ी में जँचती हो।

तीखे तेवर कर में चप्पल, रण चंडी लगती हो॥

******************
२. आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी
कुण्डलिया छंद
सर पर मँजनूँ के रखी ,इसने चप्पल तान I
समझा था अबला जिसे ,वो निकली सुल्तान II
वो निकली सुल्तान, गजब है चूड़ी पायल I
ले घूँघट की ओट ,करे सौ नंबर डायल II
करती है इन्कार, नहीं रहना अब डरकर I
लोक लाज का बोझ ,सदा क्यों इसके सर पर II

मनमानी के छोड़ दे ,लेना अब तू ख़्वाब I
जिल्द पुरानी है मगर ,अन्दर नयी किताब II
अन्दर नयी किताब ,बदल ले चश्मा तू अब I
हमें बाँचना छोड़ , समझ ना खुद को तू रब II
हो घूँघट या जींस ,आज ये सब ने ठानी I
नहीं चलेगी और ,पुरुष की अब मनमानी II
******************
३. आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
दो कुंडलिया -
रे मानव है सामने , अब दुर्गा अवतार
हाथ खड्ग चाहे नहीं, पीछे है सरकार
पीछे है सरकार, लिये कानूनी फंदे
कुकुर घसीटी मान ! वसन कर देगी गंदे
अच्छा है कर जोड़, मांग माफी ऐ दानव
है दुर्गा अवतार , सामने तेरे मानव

चप्पल सोहे हाथ इक, फोन धरे इक हाथ
गंजे ! बेहतर है यही, आज झुका दे माथ
आज झुका दे माथ, लगे.. सर, पाँवों धरना
खतर नाक है राय, मगर तुम फालो करना
सुन भाई दिल फेंक, कहीं सूजे ना टक्कल
एक हाथ में फोन , सजे दूजे में चप्पल
***************************************
४. आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी
कुंडलिया
1-प्यारे चलती राह है,मत कर तू यह काम
होता है बद काम का बहुत बुरा अंजाम
बहुत बुरा अंजाम,देख होगी रुसवाई
तुझको शायद बात,हमारी समझ न आई
कहे यही तस्दीक़,उठा कर चप्पल मारे
लड़की को मत छेड़, बाज़ आ जा तू प्यारे

 

2-मनमानी तू छोड़ दे ,खेल न ऐसा खेल
छेड़ छाड़ भी जुर्म है,हो जाएगी जेल
हो जाएगी जेल,निकल जा नज़र बचाके
चप्पल अपनी मार,न दे वह तुझे उठाके
कहे यही तस्दीक़,लगे लड़की अनजानी
मत कर तू नादान,जान कर यह मनमानी

 

सार छन्द

1- छन्न पकैया छन्न पकैया,कितना सुंदर मंज़र
खड़ी सामने रंगीले के,लड़की चप्पल लेकर

2- छन्न पकैया छन्न पकैया,मची नगर में हलचल
हाथों में है घूँघट वाली,के मोबाइल चप्पल

3- छन्न पकैया छन्न पकैया,साहस खूब दिखाया
छेड़ छाड़ करने वाले को,अच्छा सबक़ सिखाया

4- छन्न पकैया छन्न पकैया,यह है घूँघट वाली
लेकिन वक़्त बुरा जब आए, बन जाए मां काली

5- छन्न पकैया छन्न पकैया,देखो पाक नज़र से
मां बेटी बहना बीवी है,जो निकली है घर से

6- छन्न पकैया छन्न पकैया,यही सज़ा है सुन्दर
हाथों को जोड़े बैठा है,वह नीचे करके सर

7- छन्न पकैया छन्न पकैया,इनको कौन सताए
ऐसा अगर करेगा कोई,हवा जेल की खाए
***************************
५. आदरणीया छाया शुक्ला जी
कुंडलिया -
तानी चप्पल मरद पे, उत्तर देगा कौन |
कलियुग हँसता खेलता , सज्जन साधे मौन ||
सज्जन साधे मौन , आह ऐसा दिन आया |
बहू उठाये हाथ , श्वसुर ने शीश झुकाया |
“छाया” अधर्म घोर, पाप करता मनमानी
खड़ा बड़ा है प्रश्न , बहू क्यों चप्पल तानी ||
 
सार छंद -
छन्न पकैया छन्न पकैया, करता क्यूँ मनमानी |
बड़े बड़े पिटते हैं अब तो, बहू ने चप्पल तानी ||
छन्न पकैया छन्न पकैया,छोड़ दे अब नादानी |
सबको रस्ता देना भैया , करो न आनाकानी ||
छन्न पकैया छन्न पकैया, शर्म लाज धो डाला |
बचेगा अब तू कैसे भैया , मुँह होगा अब काला ||
छन्न पकैया छन्न पकैया, नारी नहीं बिचारी |
बदल दिया है समय इसे तो , ये ना माने हारी ||
***********************
६. आदरणीय बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी
सारी पहने लहरिया, घर से निकली नार।
रीत रिवाजों में फँसी, लम्बा घूँघट डार।
लम्बा घूँघट डार, फोन यह कर में धारे।
किसकी नहीं मजाल, हाथ इज्जत पर डारे।
अबला इसे न जान, लाज की खुद रखवारी।
कर देती झट दूर, अकड़ चप्पल से सारी।।
*************************
७. आदरणीय सीएम उपाध्याय ’शून्य आकांक्षी’ जी
(1)
सार छंद
छन्न पकैया छन्न पकैया, आजा घूँघट वारी
सैर कराऊँ मंसूरी की, मैं दिल वाला प्यारी

छन्न पकैया छन्न पकैया, बुझा प्यास तू मोरी
मैं तेरा मतवाला भँवरा, पीने दे रस गोरी

छन्न पकैया छन्न पकैया, बुड्ढे खूसट आ जा
भाई तेरी मुझे खोपड़ी, आज बजाऊँ बाजा

छन्न पकैया छन्न पकैया, क्रोधित नारी का मन
ले उतार कर चप्पल उसने, मारी तभी दनादन

छन्न पकैया छन्न पकैया, तब महिला के आगे
हाथ जोड़कर देखो कैसा, गिरगिट माफी माँगे

(2)
कुण्डलिया
गोरी घूँघट काढ़ि के, चली जा रही नेक |
तभी राह में मिल गया, कामी लम्पट एक ||
कामी लम्पट एक, बोलता आ जा रानी |
मैं हूँ सच्चा मर्द, व्यर्थ क्यों करे जवानी ||
कहे 'शून्य' कविराय, कटी संयम की डोरी |
माफी माँगे दुष्ट, मारती चप्पल गोरी ||
***************************
८. आदरणीया राजेश कुमारी जी
दो कुण्डलिया
भारी गलती हो गई, अब खायेगा मार|
टूट पड़ी चप्पल लिए ,घूँघट वाली नार||
घूँघट वाली नार,क्रोध की भड़की ज्वाला|
हाथ जोड़ मक्कार, बना है भोला भाला||
बीच सड़क पर हाय, उतारी ऐंठन सारी|
क्षमा माँगता मर्द, करूँ, ना गलती भारी||

छेड़ा इसने नार को, इसी लिए ये हाल|
तना तना कर मारती,चप्पल लेकर लाल||
चप्पल लेकर लाल,लहरिया पहने सारी|
घूँघट मुख पर डाल,लिए मोबाइल नारी||
चौराहे के बीच,सबक दे जाय बखेड़ा|
भुगतोगे परिणाम,अगर नारी को छेड़ा||
**********************
९. आदरणीय सतविन्दर कुमार जी
कुण्डलिया

पीता जो दारू रहे,भर-भर खूब गिलास
सुख का वह परिवार के, करता जाता ह्रास
करता जाता ह्रास,आस उसकी सब खोती
लेकर चप्पल हाथ,घरैतिन चंडी होती
सतविन्दर कविराय,व्यक्ति वह सुख से जीता
तजकर मदिरापान,प्रेम रस को जो पीता।

डर-डर कर जिन्दा रहें,कम हैं ऐसी नार
नर ने धमकी दी नहीं,वे कर डालें वार
वे कर डालें वार, हाथ में चप्पल आएँ
बेलन है हथियार,सबक जिससे सिखलाएँ
सतविन्दर कविराय,चलो नर ज़रा सँभलकर
समझी अगर न बात,जियोगे तुम डर-डर कर .................. (संशोधित)

 

भाड़ा पहले तय किया,फिर वह हुई सवार
रिक्शा पर थी चल रही,इक भोली-सी नार
इक भोली-सी नार,यही चालक ने सोचा
बीच सड़क पर रोक,किया जाने क्या लोचा
सतविन्दर कविराय,उसे बस वहीं लताड़ा
मारी चप्पल चार,दिया फिर उसे न भाड़ा

 

द्वितीय प्रस्तुति
सड़क छाप यदि सोच रही तो,होगा अच्छा कैसे? ............... (संशोधित)
चौराहे पर पिट जाएगा,समझ न ऐसे-वैसे
घूँघट मुँह पे ढाँप रहीं हों,या हों पैंटों वाली
अब की बार नहीं सुन सकती,फब्ती वाली गाली

 

मत बन मजनूँ का भाई तू,तेरी नहीं लुगाई
चप्पल से वह फसल उजाड़ी,सिर पर रखी उगाई
टोका जो तूने रस्ते पर,फब्ती कस कर भारी
करे वार टकले पर देखो,थकती कब है नारी

 

ऐसे ही बस टोक दिया था,नहीं जानता था ये
अब नारी सबला होती है,नहीं मानता था ये
अब पैरों में लोट रहा है, माफी माँग रहा है
घुटनों के बल झुका हुआ है,गर्दन टाँग रहा है।

नार नहीं अब रुकने वाली,फोन हाथ में रखती   ...................... (संशोधित) 

जो करता है तंग उसे वह,चले दिखाती सख्ती
कब पोलिस को फोन मिलाना,उसको सही पता है
छेड़ रहे हैं जो नारी को,उनकी बड़ी ख़ता है।
*****************
१०. आदरणीया कल्पना भट्ट जी
सार छंदछन्न पकैया छन्न पकैया,भोली भाली नारी
घूँघट ओढ़े जब भी आती,लगती कितनी प्यारी

छन्न पकैया छन्न पकैया,लगती है दिल जानी
लंगड़ी लूली हो भले ही,या हो अंधी कानी

छन्न पकैया छन्न पकैया,सुधरो अब तुम भैया
गये ज़माने छोड़ो जी अब,मारे है ये गैया

छन्न पकैया छन्न पकैया , मैं घूँघट में रहती
गये ज़माने चुप रहने के , जब थी सब कुछ सहती

छन्न पकैया छन्न पकैया,ऐसी है ये नारी
गर कोई छेड़े जो उसको,पड़ जाती है भारी

छन्न पकैया छन्न पकैया,हाथों में ले चप्पल
सर को तबला समझ बजाती, मच जाती है हलचल।।

(संशोधित)

**********************
११. आदरणीय लक्ष्मण धामी जी
सार छंद
1
आते जाते रस्ते में जो, कल तक थी दुखियारी
खूब मनचला बनकर तूने, जिस पर फब्ती मारी
अबला हूँ कह सह लेती थी, मन की पीड़ा सारी
आज पड़ी है सबला बनकर, तुझपर ही वो भारी
2
नारी को कमजोर न समझो, मत दो उसे चुनौती
छेड़छाड़ को समझो मत तुम, होकर निडर बपौती
बने आचरण अच्छा जाकर, मंदिर करो मनौती
वरना जूती ही पाओगे, अब तो नित्य फिरौती
3
आते जाते छेड़ू उसको, देखो मत यह सपना
स्वीकार नहीं नारी को अब, जुल्म किसी का सहना
सीखो जग में हर नारी को, माता बेटी कहना
नारी का सम्मान करो नित, मान बचाओ अपना
*********************
१२. आदरणीय सतीश मापतपुरी जी
सार छंद
नारी को साड़ी में देखा , निर्जन पथ को ताका ।
मौका है चौका जड़ने का , आगे बढ़ गया बांका ।
घुंघटा से चिमटा निकलेगा , सोचा ना मरदाना ।
घिग्घी बंध गयी देख सामने , चण्डी बनी जनाना ।

हाथ जोड़कर शीश झुकाकर , रहम का फेका पासा ।
ताड़ बने ना तिल सोचकर , बरफ बनी पिपासा ।
हाथ में चप्पल खंजर लागे , सर की शामत आई ।
नमस्कार बहना कहकर के , अपनी जान बचाई ।
**********************
१३. आदरणीय अशोक रक्ताळे जी
कुण्डलिया
कर जोड़े मांगे क्षमा , ऊँची करके पीठ |
खूसट है बुड्ढा बहुत, और बहुत है ढीठ ||
और बहुत है ढीठ , मार खाकर मानेगा,
गड़ा भूमि में शीश, सत्य क्या पहचानेगा,
घूँघट वाली नारि, सोचती दूँ क्या सिरपर,
धर चप्पल दो-चार, गिरेगा खाकर चक्कर ||

आयी घर से बाप के, छोड़ रही अब साथ |
बैठ बहू के सामने , जोड़े ससुरा हाथ ||
जोड़े ससुरा हाथ , बहू से बोले घर चल,
मत री गोरी भाग, हाथ में लेकर चप्पल,
सचमुच मेरी साख , गिरेगी बनी बनाई,
बोलेंगे सब लोग , बहू ये कैसी आयी ||

सार छंद

चप्पल-चप्पल हुई धुनाई, काम अजब कर डाला |
सही हाथ में आज पड़ा है , बाबू रिक्शावाला ||
बोल रही है मैडम खुद भी, लगता भोला-भाला |
लेकिन पर्स उड़ाया इसने, पल में डाका डाला ||

आज नहीं छोडूंगी इसको, बोली घूँघट वाली |
बात-बात पर पूरे रस्ते , देता आया गाली || ............... (संशोधित)
चाँद निकल आया है आधा, तब भी करता चोरी |
माँ-बहनों को देख अकेली, करता सीना जोरी ||

हाथ जोड़ ले नाक रगड़ ले, उसकी वो ही जाने |.............. (संशोधित)
मार-मार कर ले जाऊँगी , मैं तो इसको थाने ||
अक्ल नहीं आएगी तबतक, ये डंडे खायेगा |
ऐसे ही ये रिक्शेवाला , रास्ते पर आयेगा ||
************************
१४. आदरणीय समर कबीर जी
सारछन्द
पहले मैं इस दुविधा में था,भाव समेटूं कैसे ।
सारछन्द लिख डाले इतने,आख़िर जैसे तैसे ।। 

 

क़ब तक ऐसे कष्ट सहेगी,भारत की ये नारी ।
आख़िर किस दिन हम समझेंगे,अपनी ज़िम्मेदारी ।।

 

औरत की इज़्ज़त क्या होती,ज़रा इसे समझाओ ।
खड़े तमाशा देख रहे हो,अपना फ़र्ज़ निभाओ ।।

 

हाथ जोड़ कर बैठा है क्यों,पॉँव पकड़ ले इसके ।
चप्पल से ये मारेगी तो,रह जायेगा पिस के ।।

 

चाँद निकल आया है सर पर,फिर भी समझ न आई ।
लगता है पहले भी तूने,मार बहुत है खाई ।।

 

नादाँ जिसको समझ रहा था,अबला है ये नारी ।
पहले ये मालूम नहीं था, पड़ जायेगी भारी ।।
**********************

Views: 3603

Replies to This Discussion

आदरणीया कल्पना जी,  यथा निवेदित तथा संशोधित 

सादर

धन्यवाद् आदरणीय सर |

आदरणीय सौरभ भाईजी

छंदोत्सव के सफल संचालन , सभी रचनाओं पर आपकी टिप्पणी सार्थक सुझाव और संकलन हेतु हृदय से आभार । संशोधित दोनों छंदों  को पुनः पोस्ट कर रहा हूँ , संकलन में प्रतिस्थापित करने की कृपा करें।

कुंडलिया

............................................

 

चंदू हूँ मैं प्रौढ़ भी, मारो नहीं हुजूर।

परम भक्त हनुमान का, छेड़ छाड़ से दूर॥

छेड़ छाड़ से दूर, रोमियो मुझे न कहना।

चप्पल यूँ ना तान, बंधु मैं तेरा बहना॥

ब्रेक हो गया फेल, न समझो मुझको मंदू।

सिर पर आधा चाँद ,करो मत पूरा चंदू॥

............................................

 

सार छंद

पाँव पड़ूँ मैं घूँघट वाली, दोष नहीं पर मेरा

आँचल  मुझसे लिपट गया तो छाया घना अँधेरा

 

सही समय पर ब्रेक लगाया, सत्य वचन कहता हूँ।

हाथ जोड़ मैं शीश झुकाऊँ, चप्पल से डरता हूँ॥

मैं बूढ़ा बदमाश नहीं हूँ, मार मुझे ना माई।

तू मेरी प्यारी बहना मैं, तेरा चंदू भाई॥

तीन रंग ट्रैफिक सिग्नल सी, साड़ी में जँचती हो।

तीखे तेवर कर में चप्पल, रण चंडी लगती हो॥

 

जनाब सौरभ पाण्डेय जी आदाब,'चित्र से काव्य तक'अंक 73 के सफ़ल संचालन कामयाब आयोजन और त्वरित संकलन के लिये आपको बधाई देता हूँ स्वीकार करें ।
यहाँ में मंच को ये जानकारी दे रहा हूँ कि रमज़ान के कारण मैं 25मई से एक महीने की छुट्टी पर रहूँगा,आप सभी से निवेदन है कि मेरे लिये दुआ करें कि मैं इस पाक महीने में दिल की गहराइयों से इबादत कर सकूं ।

भाई समर जी,

आपकी सच्चाई, आपके दिल की गहराई आपके चलन में छलकती है। आपको रमज़ान के इस पाक महीने बहुत सकून मिले, आप अपने में खुदा की गहराई पाएँ, यह दुआ है।

विजय निकोर

प्रिय भाई विजय निकोर जी,'जो अच्छे हैं सबको समझते हैं अच्छा'
आमीन,आपकी दुआएँ मुझे क़दम क़दम पर हौसला देती हैं,शुक्रगुज़ार हूँ आपका भाई ।

आदरणीय समर जी, आप और आपका परिवार तपस के इस नेक महीने में सभी आत्मीयजनों की दुआओं से लगातार समृद्ध होता रहे. 

आपकी प्रस्तुति से आयोजन आबाद हुआ और क़ामयाब हुआ. हार्दिक धन्यवाद और शुभकामनाएँ 

जनाब सौरभ पाण्डेय साहिब आदाब,आपकी मुहब्बतों और दुआओं के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
58 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्ताहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। क्रोध पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। साथ ही भाई अशोक जी की बात…"
1 hour ago
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"   आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी सादर, धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती राजनीति में…"
6 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"   हमारे बिना यह सियासत कहाँजवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।... विडम्बना…"
7 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"   सूर्य के दस्तक लगानादेखना सोया हुआ है व्यक्त होने की जगह क्यों शब्द लुंठितजिस समय…"
7 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"      तरू तरु के पात-पात पर उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास मेरा मन क्यूँ उन्मन क्यूँ इतना…"
7 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, क्रोध विषय चुनकर आपके सुन्दर दोहावली रची है. हार्दिक बधाई स्वीकारें.…"
7 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया.…"
7 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"   आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
7 hours ago
Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । हार्दिक बधाई "
8 hours ago
Sushil Sarna commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं…"
8 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service