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"स्वर्ग इसी धरा पर ही है"

मंद -मंद बयार का झोका ,
पेड़ की टहनियों का झुकना!
झरने से निकलती कल-२ ध्वनि ,
दिनकर का बदली में छुपना!


प्रसून से निकलती सुगंध,
वृक्षों का आलिंगन करना !
चिड़ियों का मधुर गुनगुनाना ,
खुशियों भरा सुन्दर बहाना !


नदियों वृक्षों संग गुज़ारा ,
प्रकृति का अनुपम खज़ाना !
स्वर्ग इसी धरा पर ही है ,
सभी प्राणियों को बतलाना !


राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 19, 2013 at 11:33am

प्रकृति का सुंदर वर्णन करती रचना हेतु बधाई आपको 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 18, 2013 at 8:10pm

प्रयास सुखद है ................बधाई हो


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 18, 2013 at 8:07pm

आपका प्रयास रंग लाता रहे. अब आप मात्राओं की गणना को गंभीरता से ले रहे हैं.

शुभ-शुभ

Comment by Meena Pathak on February 18, 2013 at 6:56pm

बहुत सुन्दर प्रक्रति का चित्रण किया है आप ने पाठक जी .... बधाई स्वीकारें

Comment by Aarti Sharma on February 18, 2013 at 4:43pm

अच्छी प्रस्तुति पाठक जी ..बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 18, 2013 at 2:03pm

सही लिखा है आपने स्वर्ग इसी धरा पर है, हर कार्य में, वातावरण में, हर मौसम में हर जगह ख़ुशी का इजहार करना, सुखमय अहसास करना स्वर्ग के सामान सुख का अहसास दिलाता है । रचना के लिए बधाई 

Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 11:31am

प्रकृति का सुन्दर चित्रण ... बधाई 

Comment by vijay nikore on February 18, 2013 at 8:29am

आदरणीय राम शिरोमणि जी,

 

बधाई...अच्छा लिखा है।

 

विजय निकोर

 

 

Comment by Ashok Kumar Raktale on February 18, 2013 at 7:54am

भाई श्री राम शिरोमणि जी सुन्दर रचना भाव बधाई स्वीकारें. मगर चिड़ियों का गुनगुनाना कुछ ठीक नहीं है चिड़ियों का तो चहचहाना ही सही है.

Comment by Tushar Raj Rastogi on February 17, 2013 at 8:10pm

बहुत सुन्दर रचना | आभार

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