सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है
व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो
साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है
धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है
अब प्रतीक्षा क्यों, शलाका हाथ ले लो
कोड़ दो संसार
तम बोया हुआ है
***
मौलिक और अप्रकाशित
Comment
रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.
आपका हार्दिक धन्यवाद
उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी
नव वर्ष की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और सोच की जड़ता पर प्रहार करता आपका यह नवगीत वास्तव में मुझे एक प्रयाण गीत जैसा उद्बोधन करता हुआ प्रतीत हुआ जो अपने उद्देश्य पूरी तरह सफल है !इस उल्लेखनीय नवगीत हेतु आप निश्चय ही बधाई के पात्र हैं, आदरणीय भाई सौरभ जी !
सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है
व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो... शीतकाल में सूर्य का ना प्रकट होना जब कि संसार नव वर्ष का ढोल पीट रहा है. किन्तु प्रकृति में तो धुंध है, उदासी है. यही मन करता है सूर्य के दर पर एक दस्तक हो. सभी उत्साहियों को अवगत कराने का यह समय है.
आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, सुन्दर जाग्रति लाता नवगीत रचा है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
इस स्नेहिल अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी.
आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। उत्तम नवगीत हुआ है बहुत बहुत हार्दिक बधाई।
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