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प्रदीप देवीशरण भट्ट
  • Male
  • हैदराबाद (तेलांगाना)
  • India
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प्रदीप देवीशरण भट्ट's Friends

  • Sheikh Shahzad Usmani
  • Samar kabeer
 

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Page

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Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अपने आप में
"जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,बहुत अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Thursday
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

अपने आप में

"यदि तुम्हेंउससे प्रेम है अनंत!तो तुम स्वीकारक्यूँ नहीं करते। क्यूँ नहीं देख पातेउसकी आंखों का सूनापनजहाँ बरसों से नही बरसीप्रेम की एक बूंद तुम्हारे ह्रदय मेंसबके लिए है प्रेमकिंतु उसके लिएहो जाते हो ह्र्दयहीन ये कैसा प्रेम हैजहाँ ना स्नेह है ना चैनजहाँ स्व्तंत्र्ता नहीसिर्फ और सिर्फ बंधन क्यूँ नहीं दे देतेउसे भी स्वतंत्रताताकि वो भी रह सकेअपने में मगन थोड़ा सा ही सहीरह सके वो भी प्रसन्नजैसे तुम रहते होअपने आप में"-प्रदीप देवीशरण भट्ट-27.06.2019,मौलिक एव्म अप्रशितSee More
Wednesday
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

ज़ीस्त

ज़ीस्त को मुझसे है गिला देखोजी रहा हूँ मैं हौसला देखोसाथ रहते हैं एक छत के तलेदरम्याँ फिर भी फासला देखोतुम जिधर जा रहे हो बेखुद सेवहीं आयेगा जलजला देखोसँभाल ही लूँगा मरासिम सारेतुम कोई और मुआमला देखोप्यार पे उसको दो नही ख़ुत्बादुध का वो भी है जला देखोउसने मकबूलियत भी देखी हैशम्स उसका है अब ढला देखोहवा है गुम मगर उमीद तो रखएक पत्ता है फिर हिला देखोचला था मैं अकेला ही मगरसाथ अब मेरे काफिला देखोजो भी आया उसको है जाना‘दीप’ ज़ारी ये सिलसिला देखो ख़ुत्बा=भाषणमरासिम=रिश्तेदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अ…See More
Jul 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post ज़ीस्त
"अजय तिवारी जी प्रणाम, आप का हुक्म सर आंखों पर्।"
Jul 8
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post ज़ीस्त
"जी समर ही लगभग दो दशक पहले की रचना है, जियादा कुछ पता नही था {मेरा मानना है अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है} प्रयास करता रहूँगा। अगर आप उचित समझे तो मुझे अपना मोबाइल नम्बर दे दें, ताकि आपका मार्गदर्शन  लिया जा सके। मेरा मोबाईल नम्बर-9867678909…"
Jul 8
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post नादान बशर
"शुक्रिया समर जी, ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहिए, बंदा भी कुछ सीख जाएगा।"
Jul 8
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Dr.Prachi Singh's blog post ..ऐसा हो तो फिर क्या होगा (गीत) ~ डॉ. प्राची
"" कंदीलों की ओट तले तुझको झिलमिल-झिलमिल जलना है मैं मशाल हूँ सिद्धांतों की मुझे हवाओं से लड़ना है ...जाने किस पल मैं बुझ जाऊँ, ऐसा हो तो फिर क्या होगा ? ...साँझ ढले और मैं ना आऊँ, ऐसा हो तो फिर क्या होगा" बेहतरीन प्राची जी बधाई"
Jul 8
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"खुबसुरत गज़ल हुई त्रिपठी जी "
Jul 8
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post नादान बशर
"जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं' इस मिसरे में रदीफ़ बदल गई है,देखें । 'जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,' इस मिसरे में 'ज़्यादा' की जगह…"
Jul 7
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post ज़ीस्त
"जनाब प्रदीप जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । जनाब अजय तिवारी साहिब की बातों का संज्ञान लें,कुछ बातें मैं आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा । 'मैं जी रहा हूँ हौसला देखो' ये मिसरा बह्र में नहीं,यूँ कर सकते हैं:- 'जी रहा…"
Jul 7
Ajay Tiwari commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post ज़ीस्त
"आदरणीय प्रदीप जी, सम्भाँल ही लूँगा मरासिम सारे > सही शब्द 'सँभाल'(121) है. मिसरा फिर से देखिएगा.    हवा है गुम मगर उम्मीद तो रख > बह्र में नहीं है.  'है हवा गुम मगर उमीद तो रख' किया जा सकता है. अच्छे शेर…"
Jul 6
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

नादान बशर

दर्दों गम से हर कोई बेजार है,हादसों की हर तरफ़ दीवार है। बिक रहे हैं वो भी जो अनमोल हैं, कैसे नादानों का ये बाज़ार हैं। सब्र अब सबका चुका लगता मुझे,हर बशर लड़ने को बस तैय्यार है। पल में तोला पल में माशा मत बनो,ये भी जीने का कोई आधार है। मुफलिसी के मारे लगते हैं सभी,फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं। जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,उनकी ही उतनी बड़ी सरकार है। अब भरोसा भी करें किस पर ‘प्रदीप’दिल है नादां और जहाँ अय्यार है।.-प्रदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अप्रकशित02-07-2019See More
Jul 6
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

ज़ीस्त

ज़ीस्त को मुझसे है गिला देखोजी रहा हूँ मैं हौसला देखोसाथ रहते हैं एक छत के तलेदरम्याँ फिर भी फासला देखोतुम जिधर जा रहे हो बेखुद सेवहीं आयेगा जलजला देखोसँभाल ही लूँगा मरासिम सारेतुम कोई और मुआमला देखोप्यार पे उसको दो नही ख़ुत्बादुध का वो भी है जला देखोउसने मकबूलियत भी देखी हैशम्स उसका है अब ढला देखोहवा है गुम मगर उमीद तो रखएक पत्ता है फिर हिला देखोचला था मैं अकेला ही मगरसाथ अब मेरे काफिला देखोजो भी आया उसको है जाना‘दीप’ ज़ारी ये सिलसिला देखो ख़ुत्बा=भाषणमरासिम=रिश्तेदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अ…See More
Jul 5
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"किया मुद्दतों तक वो जी हुजूरी ।सुना है कि जिसका खिताब तय है वाह क्या शेर है नवीन जी बधाई"
Jul 4
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Samar kabeer's blog post एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल
"samar ji pranam, bahut khub huzur"
Jul 4
प्रदीप देवीशरण भट्ट shared Samar kabeer's blog post on Facebook
Jul 4

Profile Information

Gender
Male
City State
हैदराबाद
Native Place
रुडकी (उत्तराखंड)
Profession
Government
About me
Superintendent in KVIC, हैदराबाद

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Blog

अपने आप में

"यदि तुम्हें

उससे प्रेम है अनंत!

तो तुम स्वीकार

क्यूँ नहीं करते।

 

क्यूँ नहीं देख पाते

उसकी आंखों का सूनापन

जहाँ बरसों से नही बरसी…

Continue

Posted on July 9, 2019 at 6:00pm — 1 Comment

नादान बशर

दर्दों गम से हर कोई बेजार है,

हादसों की हर तरफ़ दीवार है।

 

बिक रहे हैं वो भी जो अनमोल हैं,

 कैसे नादानों का ये बाज़ार हैं।

 

सब्र अब सबका चुका लगता मुझे,

हर बशर लड़ने को बस तैय्यार है।

 

पल में तोला पल में माशा मत बनो,

ये भी जीने का कोई आधार है।

 

मुफलिसी के मारे लगते हैं सभी,

फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं।

 

जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,

उनकी ही उतनी बड़ी सरकार…

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Posted on July 4, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

ज़ीस्त

ज़ीस्त को मुझसे है गिला देखो

जी रहा हूँ मैं हौसला देखो

साथ रहते हैं एक छत के तले

दरम्याँ फिर भी फासला देखो

तुम जिधर जा रहे हो बेखुद से

वहीं आयेगा जलजला देखो

सँभाल ही लूँगा मरासिम…

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Posted on July 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

मेंरी लाडली

जब तू पैदा हुई थी

तो मैं झूम के नाचा था

मेरी गोद में आकर

जब तूने पलकें झपकाई

मैंने अप्रतिम प्रसन्नता क़ो

अनुभव किया था

फ़िर तू शनै शनै

बेल की तरह बड़ी…

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Posted on June 24, 2019 at 11:30am — 1 Comment

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At 7:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

 
 
 

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