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भीड भरे रस्ते पे एक दिन,

बरसोँ पुराना दोस्त मिला । 

चेहरे से मुस्कान थी गायब,

स्वर भी कुछ रुखा सा मिला । । 

 

मैंने पूछा कैसे हो तुम,

वो बोला कुछ ठीक नहीं । 

मैंने पूछा और हाल-ए-इश्क,

सोच के बोला ली भीख नही । । 

 

उसके इस उत्तर से अचम्भित,

ठिठक  गया  मैं  चलते-चलते । 

फिर काँधे पे हाथ रख पूछा,

किसी से नहीं क्या मिलते-जुलते । । 

 

एक लम्बी ले शवाँस वो बोला,  

फिर राज़ दहर का सगरा खोला । 

मैंने जिसको चाहा,उसका मन,

और किसी की चाहत में डोला । । 

अब धीरे धीरे उमर जा रही,

आस का दीपक नही पा रही । 

अंत समय का कोई ना साथी,

दिल की धड्कन बैठी जा रही ।  । 

अब राह मिले ना मंज़िल कोई,

फिर भी ढुंढू मिल जाए कोई । 

जिससे दिल के मैं तार मिला दूँ,

मैं भी हूँ इंसा दिखला दूँ । । 

 

 

इतना कहकर वो चुप हो गया,

माज़ी में मैं भी था खो गया । 

अगले पल जब तंद्रा टूटी,

दर्द था उसका जो मेरा हो गया । । 

 

जीवन की आपाधापी में,

हम भूल गये सब रिश्ते नाते । 

हाय हैलो भी दूरभाष पर,

करके हम सब रस्म निभाते । । 

 -प्रदीप देवीशरण  भट्ट-

मौलिक व अप्रकशित

 

 

 

 

 

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 17, 2019 at 12:54pm

समर जी शुक्रिया

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 17, 2019 at 12:53pm

आभार हरिओम जी

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 17, 2019 at 12:51pm

शुक्रिया नीलम जी,

Comment by Neelam Upadhyaya on April 3, 2019 at 12:37pm

अच्छी रचना पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय प्रदीप भट्ट जी।

Comment by Samar kabeer on April 2, 2019 at 10:52am

जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 1, 2019 at 5:06pm

बहुत खूब। हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप देवीशरण भट्ट साहिब।

कृपया ध्यान दे...

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