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नारी तो केवल है नारी है    

नर भी तो केवल है नर      

दोनोँ के विचार अलग हैं

दोनोँ के किरदार अलग

ना इसका कुछ हिस्सा ज्यादा

ना ही उसका है कुछ कम

 

कभी कभी लगता है ऐसे

जैसे जीवन निपट अधूरा

निकट तो हो लेकिन लगता है

नभ पर तुमने डाला डेरा

ऐसा है फिर भी जीवन में

उठ्ती रहती सतरंगी तरंग

 

पथगामी दोनोँ एक पथ के

चलते किंतु अलग अलग

कभी कभी व्यहार वो करते

जैसे घर में रहता कोई मलंग

लक्ष्य मगर दोनोँ का एक है

कभी ना हारे शिशु कोई जंग

.

-प्रदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अप्रकशित

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 4, 2019 at 11:18am

नमस्कार अमित जी

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 4, 2019 at 11:17am

धन्यवाद समर जी

Comment by AMIT on April 3, 2019 at 1:39pm
नमस्कार सर !
Comment by Samar kabeer on April 3, 2019 at 12:22pm

जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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