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MUZFFRABAD
Profession
BUSSINESS
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POET & Story writer

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ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मिलन की रात का लम्हा छुपा है

नज़र में बस तेरा चेहरा छुपा है

 दुआ लेकर निकलना रोज़ घर से 

यहाँ हर मोड़ पर ख़तरा छुपा है

लबों पर प्यास लेकर फिरने वाले

तेरे अंदर भी इक दरिया छुपा है

महकती है हमेशा ज़ीस्त यूँ भी

कि सांसों में तेरा गजरा छुपा है

सनम मत जा अभी ख़्वाबों से मेरे

अभी तो चाँद भी आधा छुपा है

'अहद' लिखना न होगा बंद मेरा

अभी दिल में बहुत लावा छुपा है !

मौलिक और…

Continue

Posted on April 3, 2019 at 2:06pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो न देगा दान मन्दिर के लिये

कुछ नहीं रब एक काफ़िर के लिये



लोग जिसकी शान में दिल से झुकें

ताज ऐसा चाहिए सिर के लिये



हौसला जिंदा रहे दिल में अगर

मुश्किलें क्या हैं मुसाफ़िर के लिये



इक पहेली बन गया है ऐ सनम

अक्स तेरा हर मुसव्विर के लिये



जाम,साकी,फूल ,तितली भूल जा

कुछ तो लिख तू दौरे हाज़िर के लिये



जिस्म ही वो चाहता है,दिल नहीं

प्यार है इक खेल शातिर के लिये



ज़ीस्त में कुछ तो कमा ले नेकियां

एक… Continue

Posted on September 28, 2017 at 6:45pm — 1 Comment

ग़ज़ल

ग़ज़ल

जीवन का मक़सद देखेगी

दुनिया तेरा कद देखेगी



खादी पहने इन गुंडों को

कब तक ये संसद देखेगी



फिरकापरस्ती बदनज़रों से

मस्जिद का गुम्बद देखेगी



सूखी धरती उम्मीदों से

बारिश की आमद देखेगी



तू हो चाहे जितना अच्छा

दुनिया तुझको बद देखेगी



दुनिया तेरी सब यादों को

मुझसे ही बरामद देखेगी



खून जवानों का यूँ बहते

कब तक ये सरहद देखेगी



गाँव अगर जाऊँ तो आँख

फिर सूखा बरगद देखेगी



करने… Continue

Posted on September 26, 2017 at 6:58pm — 8 Comments

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At 9:49pm on November 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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