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2122 2122 2122 212

प्यार का तुमने दिया मुझको सिला कुछ भी नहीं,
मिट गये हम तुझको लेकिन इत्तिला कुछ भी नहीं।

कोख में ही मारकर मासूम को बेफ़िक्र हैं,
फिर भी अपने ज़ुर्म का जिनको गिला कुछ भी नहीं।

राह जो खुद हैं बनाते मंजिलों की चाह में ,
मायने उनके लिए फिर काफिला कुछ भी नहीं।

हौंसले रख जो जिये पाये सभी कुछ वे यहाँ,
बुज़दिलों को मात से ज्यादा मिला कुछ भी नहीं।

ज़िंदगी चाहें तो बेहतर हम बना सकते यहाँ,
ज़ीस्त में ग़र रंजोगम का दाखिला कुछ भी नहीं।

रहते जो हर हाल में खुश वो कहाँ कहते कभी,
*जिंदगी में जिंदगी जैसा मिला कुछ भी नहीं*।

चाह 'शुचिता' प्रेम की रख मंजिलें करती है तय,
प्रेम जीवन में अगर तो अधखिला कुछ भी नहीं।

मौलिक व अप्रकाशित




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Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 18, 2019 at 2:05pm

प्रोत्साहन एवम मार्गदर्शन हेतु आप सभी का आभार व्यक्त करती हूँ।

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:05am

आदरणीया सुचिसंदीप जी, अपनी ग़ज़ल और ग़ज़ल पर हुई सार्थक चर्चा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 16, 2019 at 6:13am

आद0 सुचिसंदीप अग्रवाल जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल का बढिया कोशिश है, शेष आद0 समर साहब ने विस्तृत रूप से बता दिया है, प्रयास जारी रखें। बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Samar kabeer on January 14, 2019 at 12:13pm

// मतले में सिला और इत्तिला  अलिफ और ऐन का काफ़िया क्या सही माना जा सकता है?//

ये क़ाफ़िया सहीह नहीं है ।

// दूसरा 4 शेर में जो जिये दोनो हर्फ़े में मात्रा अलग होने से भी पढ़ने में जोजिये  होने से शब्द विकृत हो रहा है तो क्या इसे तनाफुर माना जाए या परिभाषा के अनुसार तनाफुर नहीं माना जाए//

इसमें तनाफ़ुर नहीं माना जायेगा ।

Comment by Ravi Shukla on January 14, 2019 at 11:07am

आदरणीया शुचिता जी ग़ज़ल के लिए दिली बधाई कुबूल करें । आपकी ग़ज़ल के बहाने से दो बिंदुओं पर विद्वत जन की राय जानना चाहेंगे मतले में सिला और इत्तिला  अलिफ और ऐन का काफ़िया क्या सही माना जा सकता है? दूसरा 4 शेर में जो जिये दोनो हर्फ़े में मात्रा अलग होने से भी पढ़ने में जोजिये  होने से शब्द विकृत हो रहा है तो क्या इसे तनाफुर माना जाए या परिभाषा के अनुसार तनाफुर नहीं माना जाए। सादर

Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 12:02pm

"सुचिसंदीप जी" बहुत सूंदर रचना बधाई स्वीकारें

Comment by Samar kabeer on January 9, 2019 at 11:28am

एक बात कल बताना भूल गया था:-

'मिट गये हम तुझको लेकिन इत्तिला कुछ भी नहीं'

इस मिसरे में 'इत्तिला' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है "इत्तिला'अ''जिसका वज़न होगा2121 ।

Comment by सुचिसंदीप अग्रवालl on January 9, 2019 at 11:05am

हार्दिक आभार आदरणीय बासुदेव भैया। आपका  मार्गदर्शन पाकर आह्लादित हुई।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 9, 2019 at 10:50am

सुचि बहन आ0 समर कबीर जी की इस्लाह के बाद ग़ज़ल में चार चांद लग गए। मक्ता यूँ कर सकती हो

प्रेम की शुचिता बहाकर जिंदगी में तुम जिओ

Comment by Samar kabeer on January 8, 2019 at 10:49pm

मक़्ता अभी और काम चाहता है ।

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