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दुर्गा - लघुकथा –

दुर्गा - लघुकथा –

शुरू में मैंने दुर्गा को एक महीने के लिये ट्रायल पर रखा था क्योंकि उसे देखकर लगता नहीं था कि काम वाली बाई है। खूबसूरत और जवान तो थी ही लेकिन साथ ही गज़ब की स्टाइलिश और फ़ैशनेबिल। चटकीली सुर्ख लिपस्टिक, गॉगल, मोबाइल, बड़ा सा लेडीज पर्स भी रखती थी।

मुझे बहुत तनाव रहता था जब वह पतिदेव की उपस्थिति में आती थी। ऐसे में मुझे अतिरिक्त सावधानी रखनी पड़ती थी। हालाँकि पतिदेव का इतिहास साफ सुथरा था। पर मर्द जात का क्या भरोसा। ऊपर से दुर्गा के लटके झटके। एक बार तो मैंने उसे कह भी दिया था कि दुर्गा नाम तुम पर सही नहीं लगता। मेनका या उर्वशी होना चाहिये|

लेकिन आज  मेरी सारी आशंकाओं को दुर्गा ने चूर चूर कर दिया। हुआ यूँ कि दुर्गा रसोईघर में थी। पतिदेव दौरे पर गये थे। बेटा हॉस्टल में था।

मैं और दुर्गा ही थे घर में।डोर बेल बजी। मैंने द्वार खोला तो एक हट्टा कट्टा लड़का कोरियर लेकर आया था।मैं उसके दिये कागज पर हस्ताक्षर करने लगी तो अचानक उसने मेरे गले पर चाकू रख दिया। इसी बीच उसका दूसरा साथी भी अंदर आ गया। मुझे पूरी तरह कब्जे में कर लिया और बेड रूम की ओर खींच ले गये। मेरी अलमारी की चाबी छीन ली। मेरे हाथ बाँध दिये।

मन में अजीब सी शंकायें जन्म लेने लगीं कि मेरे साथ कुछ गलत ना करें। कहीं मुझे मार ही ना दें।।मुझे एक पल को तो इस घटना क्रम में दुर्गा की साजिश लगी।मैं उस घड़ी को कोसने लगी जब दुर्गा को रखा था|

"रुको कमीनो, अपनी  माँ की उम्र की औरत पर अपनी जवानी दिखा रहे हो। आओ मुझ पर आजामाओ अपनी ताक़त।"

दुर्गा दरवाजे के बीचोंबीच हाथ में चाकू लिये खड़ी थी।

"मैडम, आप डरिये मत,मैंने पुलिस को फोन कर दिया है। तब तक इन दोनों के लिये तो मैं अकेली ही काफी हूँ।"

दुर्गा के इस अप्रत्याशित कृत्य से उन दोनों के हाथ पैर फूल गये। उनको यह आभास नहीं था कि घर में कोई और भी है। अब वे रोने और गिड़गिड़ाने लगे।शायद नौसिखिये चोर थे।

पुलिस आकर उनको लेगयी ।

"दुर्गा, तुम सचमुच ही दुर्गा हो। मुझे तुम पर गर्व है।" मैंने बरबस उसे गले लगा लिया।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 4, 2018 at 8:57am

हार्दिक आभार आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 29, 2018 at 6:52pm

बड़ी अच्छी लघु कथा लिखी है आदरणीय...

Comment by TEJ VEER SINGH on September 28, 2018 at 9:21am

हार्दिक आभार आदरणीय नीलम जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 28, 2018 at 9:20am

हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोरे जी।

Comment by Neelam Upadhyaya on September 26, 2018 at 4:14pm

आदरणीय  तेजवीर सिंह जी, नमस्कार। बहुत ही अच्छी  लघुकथा हुई  है।  बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on September 26, 2018 at 3:24pm

आपकी लघुकथा बहुत ही अच्छी लगी, आदरणीय तेज वीर सिंह जी। हार्दिक बधाई।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 24, 2018 at 6:06pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब।

Comment by Samar kabeer on September 24, 2018 at 12:15pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 23, 2018 at 11:17am

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 23, 2018 at 10:06am

ऐसा भी होता तो है। विदेश में सेटल मेरी एक पूर्व स्टूडेंट की आया ने चोरी कर उसे क़त्ल किया था। लेकिन ऐसी दुर्गायें भी होती हैं नाम सार्थक कर बेहद वफादार। हार्दिक बधाई इस रचना के लिए, आदरणीय तेजवीर सिंह साहिब।

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