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ग़ज़ल नूर की - रफ़्ता रफ़्ता अपनी मंज़िल से जुदा होते गए

रफ़्ता रफ़्ता अपनी मंज़िल से जुदा होते गए,
राह भटके लोग जिनके रहनुमा होते गए.
.
तज़र्बे मिलते रहे कुछ ज़िन्दगी में बारहा
कुछ तो मंज़िल बन गए कुछ रास्ता होते गए.
.  
चुस्कियाँ ले ले के अक्सर मय हमें पीती रही  
वो नशा होती गयी हम पारसा होते गए.
.
उन चिराग़ों के लिए सूरज ने माँगी है दुआ
सुब्ह तक जलते रहे जो फिर हवा होते गए.
.
ज़िन्दगी की राहों पर जब धूप झुलसाने लगी
पल तुम्हारे साथ जो गुज़रे घटा होते गए.
.
फिर मुहब्बत के सफ़र में वो भी मंज़िल आ गयी
दर्द ही जब ख़ुद-ब-ख़ुद अपनी दवा होते गए.
.
पत्थरों के शह्र में सब लोग पत्थर ही के थे  
आईने को देख कर कुछ आईना होते गए.
.
“नूर” तुझ को छोड़ना होगा हमें मालूम था
फिर भी ऐ दुनिया! तुझी से आश्ना होते गए.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Thursday

आ. भाई नीलेश जी, बेहतरीन गजल हुयी है , हार्दिक बधाई।

Comment by babitagupta on Wednesday

बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा ,आदरणीय सरजी।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 12, 2018 at 12:00pm

शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 12, 2018 at 12:00pm

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Mohammed Arif on August 12, 2018 at 7:28am

आदरणीय नीलेश जी आदाब,

                        बहुत ही नायाब ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by Ravi Shukla on August 10, 2018 at 8:30pm

आदरणीय नीलेश जी अच्छी गजल के  लिए मुबारक बाद पेश है सच में फोन में तज्रिबा  लिखना बड़ा कठिन काम हो जाता है 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 10, 2018 at 8:00am

जी समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on August 10, 2018 at 8:00am

धन्यवाद आ. नीलम जी 

Comment by Samar kabeer on August 9, 2018 at 4:37pm

//टाइपिंग सॉफ्टवेर में दिक्कत के चलते गलती हुई है..//

जी,मुझे पहले आप बता चुके हैं,लेकिन मंच पर लिखना पड़ता है,आप जानते ही हैं ।

Comment by Neelam Upadhyaya on August 9, 2018 at 4:19pm

आदरणीय नीलेश जी, नमस्कार।  बहुत ही उम्दा ग़ज़ल की पेशकश ।  बधाई स्वीकार करें। 

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