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2122 1212 22/112/211
कुछ नहीं सूझता कई दिन से
जाने क्या हो रहा कई दिन से?

है अलग ये जुबाँ निगाहें अलग
क्यों नहीं राबता कई दिन से।

हो लबों पे हँसी भले कितनी
मन रहा डगमगा कई दिन से।

जल रहा दिल कोई सही में कहीं
गर्म लगती हवा कई दिन से।

खुद पे खुद का नहीं रहा काबू
यूँ चढ़ा है नशा, कई दिन से।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Rakshita Singh on June 15, 2018 at 3:15pm

आदरणीय सतविन्द्र जी नमस्कार, बहुत ही बेहतरीन शेर

"खुद पे खुद का नहीं रहा काबू
यूँ चढ़ा है नशा, कई दिन से।" बहुत-बहुत मुबारकबाद ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:50pm

आदरणीय महेंद्र कुमार जी सादर नमन! उत्साहवर्धन एवं मार्गदर्शन के लिए सादर आभार। प्रयास करता हूँ और दुरुस्त करने का। सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:49pm

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी सादर वन्दन! उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:47pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ,सादरनमन! उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:47pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी सादर नमन! हार्दिक आभार उत्साहवर्धन के लिए। व्यस्तता के कारण न रचनाकर्म हो रहा है न अध्ययन। यही वजह रही कि ओबीओ पर किसी भी आयोजन में सम्मिलित नहीं हो पाया। प्रयास रहेगा कि इस माह के उत्सवों में भाग लूँ। सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:44pm

आदरणीय बसन्त कुमार शर्मा जी सादर नमन, हार्दिक आभार उत्साहवर्धन के लिए।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 13, 2018 at 7:42pm

आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी ,अनुमोदन और उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार, नमन!

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 12:26pm

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय सतविन्द्र जी पर मिसरे अभी और बेहतर हो सकते हैं. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Neelam Upadhyaya on June 13, 2018 at 11:52am

आदरणीय सतविंदर जी, नमस्कार । बेहतरीन गजल हुई है । मुबारकबाद कुबूल करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2018 at 6:40am

आ. भाई सतविंद्र जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

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