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ग़ज़ल नूर की -पार करने हैं समुन्दर ये दिलो-जाँ वाले

२१२२ /११२२ /११२२ /२२
.
पार करने हैं समुन्दर ये दिलो-जाँ वाले
और आसार नज़र आते हैं तूफाँ वाले.
.   
फ़ितरतन मुश्किलें; मुश्किल मुझे लगती हीं नहीं     
पर डराते हैं सवाल आप के आसाँ वाले.

.
तितलियाँ फूल चमन सारे कशाकश में हैं
एक ही रँग के गुल चाहें गुलिस्ताँ वाले.
.
ये न कहते कि रखो एक ही रब पर ईमाँ
इश्क़ करते जो अगर गीता-ओ-कुरआँ वाले.  
.
जानवर हैं कई, इंसान की सूरत में यहाँ
शह्र में रह के भी हैं तौर बयाबाँ वाले.  
.
आप चेहरे से तो इंसान नज़र आते हैं
आप के ढब नहीं लगते मगर इंसाँ वाले. 
.
‘नूर’ पर दाग़ लगाने कि तमन्ना है जिन्हें
वो मेरे यार हैं शफ़्फ़ाफ़ गरेबाँ वाले.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 7:20pm

धन्यवाद आ. दिनेश जी,
अभी कोई चुनाव नहीं हैं इसलिए थोडा समय ग़ज़ल को दे पा रहा हूँ वरना मुझ पे लाज़िम  है कि अपना पूरा समय सामाजिक न्याय की लड़ाई में दूँ... ज्यादतियों   का विरोध   करूँ...
साहित्यकार सत्ता के चरणों में नतमस्तक हो   जाय तो भाट कहलाता है 
सादर 

Comment by दिनेश कुमार on April 8, 2018 at 7:14pm

आप पुनः form में आ गए हैं आ. निलेश सर।  मतले स मक़्ते तक सभी अशआर पर दिल से वाह निकली है। मुबारक बाद सर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 12:57pm

धन्यवाद आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहब 
आभार 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2018 at 11:47am

बेहतरीन बहुआयामी संदेश देते मतले और मक़्ते के साथ बेहतरीन ग़ज़ल के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और आभार आदरणीय नीलेश शेव्गांवकर जी।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 10:32am

शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ साहब,
आप     की टिप्पणी से हौसला दोगुना हो गया है, अच्छा रचने का प्रयास आगे भी रहेगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 10:31am

धन्यवाद आ. हर्ष जी,
आप की टिप्पणी हर्षदायक है 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 10:30am

शुक्रिया आ. समर सर,
आप   के स्नेह से संबल मिला है ..
आसां वाले पर अभी मैं स्वयं ही   निश्चित नहीं हूँ कि काफिया निभा है या नहीं...
शायद समय के साथ कुछ बने ..
सादर 

Comment by Mohammed Arif on April 8, 2018 at 7:43am

आदरणीय नीलेश जी आदाब,

                            लाजवाब और आकर्षित करने वाली ग़ज़ल । हर शे'र माकूल । अबतक की आपकी सबसे अच्छी ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

Comment by Harash Mahajan on April 7, 2018 at 10:04pm

आदरणीय नीलेश जी बहुत ही उम्दा दिली दाद सर ।

"आप चेहरे से तो इंसान नज़र आते हैं 
आप के ढब नहीं लगते मगर इंसाँ वाले"

बेहतरीन सर ।

सादर !

Comment by Samar kabeer on April 7, 2018 at 6:01pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,वाह वाह, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही आपने,मज़ा आ गया,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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