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रोशनी का कोई  सुराख़ न सही

बेरुखी ही प्यार का अंदाज़ सही

कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं

यह माना कि जिगर में तुम्हारे

कोई तीखी  ख़राश है आज

तल्खी  है, कसक  है  बहुत

है  कशमकश  भी  बेशुमार

इस  पर  भी  परीशां  न  हो

खालीपन  को  तुम

बहरहाल  खाली  न  समझो

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे

तब  तरन्नुम  से  पढ़ना  उनको

लाज़िमी है भरेंगे वह इश्क से मिले

चुभते खलते आज के खालीपन को

बनेंगे तोहफ़ा माज़ी के इकरार का

फ़ख्र होगा मुझको भी बेअंदाज़ तुम पर

याद रखना गज़ल के अश’आर तुम्हारे

बीमार इश्क का फ़कत नज़राना ही नहीं  

वह उसकी तिलिस्मी ताहिर तामीर बनेंगे

                --------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan yesterday
खुब सुन्दर रचना
Comment by Rakshita Singh on Friday

आदरणीय विजय जी नमस्कार,  गजल से जुड़ीं बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ " 

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे"

कमाल कर दिया....दिली मुबारकबाद कुबूल करें ।।

Comment by vijay nikore on Wednesday

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय महेन्द्र जी

Comment by Mahendra Kumar on Wednesday

बढ़िया कविता है आदरणीय विजय निकोर जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by vijay nikore on Wednesday

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय सतविन्द्र जी

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on Tuesday

बहुत खूब बहुत खूब

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:22am

  सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीया कल्पना जी

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 28, 2018 at 10:07am

Waah bahut sunder

Comment by vijay nikore on March 28, 2018 at 9:06am

सराहना के लिए आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय बृजेश जी

Comment by vijay nikore on March 25, 2018 at 10:22pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर जी। सुधार-संकेत के लिए भी बहुत बहुत आभार... सुधार कर दूँगा।

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