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रोशनी का कोई  सुराख़ न सही

बेरुखी ही प्यार का अंदाज़ सही

कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं

यह माना कि जिगर में तुम्हारे

कोई तीखी  ख़राश है आज

तल्खी  है, कसक  है  बहुत

है  कशमकश  भी  बेशुमार

इस  पर  भी  परीशां  न  हो

खालीपन  को  तुम

बहरहाल  खाली  न  समझो

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे

तब  तरन्नुम  से  पढ़ना  उनको

लाज़िमी है भरेंगे वह इश्क से मिले

चुभते खलते आज के खालीपन को

बनेंगे तोहफ़ा माज़ी के इकरार का

फ़ख्र होगा मुझको भी बेअंदाज़ तुम पर

याद रखना गज़ल के अश’आर तुम्हारे

बीमार इश्क का फ़कत नज़राना ही नहीं  

वह उसकी तिलिस्मी ताहिर तामीर बनेंगे

                --------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on June 25, 2018 at 9:59am

आपका हार्दिक आभार, आ० रक्षिता जी

Comment by vijay nikore on June 25, 2018 at 9:58am

आपका हार्दिक आभार, आ० नरेन्द्रसिहँ जी

Comment by narendrasinh chauhan on June 16, 2018 at 2:15pm
खुब सुन्दर रचना
Comment by Rakshita Singh on June 15, 2018 at 3:11pm

आदरणीय विजय जी नमस्कार,  गजल से जुड़ीं बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ " 

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे"

कमाल कर दिया....दिली मुबारकबाद कुबूल करें ।।

Comment by vijay nikore on June 13, 2018 at 1:00pm

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय महेन्द्र जी

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 12:29pm

बढ़िया कविता है आदरणीय विजय निकोर जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by vijay nikore on June 13, 2018 at 6:51am

सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय सतविन्द्र जी

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 12, 2018 at 7:02pm

बहुत खूब बहुत खूब

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:22am

  सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीया कल्पना जी

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 28, 2018 at 10:07am

Waah bahut sunder

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