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विक्रेता (लघुकथा) - सुनील वर्मा

नासमझी में की गयी ग़ल्तियों को अपनी कमज़ोरी का कारण समझ, आशंकित भविष्य कच्ची पक्की सलाह लेकर सड़क किनारे बने उस तंबू तक जा पहुँचा। परदे को हटाकर उसने आवाज़ लगायी "अंदर कोई है..?"
भीतर बैठे अंधेरे ने दरवाज़े पर खड़े ग्राहक को देख एक मुस्कान दी और उसे अंदर बुला लिया।
कुछ देर की गैर आवश्यक पूछताछ के बाद उस भय विक्रेता ने भविष्य को दस-पन्द्रह पुड़ियाओं के साथ 'बहुत सारा डर' भी बेच दिया।
"ये कोई नुकसान तो नही करेगी न.." भविष्य ने थोड़ी सी समझ दिखानी चाही।
"एकदम आयुर्वेदिक है। राजा महाराजा तक इसे ही इस्तेमाल करते थे। बेफिक्र रहो।" अँधेरे ने कहा तो वहीं बैठे छद्म आयुर्वेद ने भविष्य की छुपी हुई समझ को भी हाथ पकड़कर उसके दिमाग से बाहर कर दिया।
पैसों को अपनी जेब में रखते हुए उसने वहाँ से उठने का उपक्रम करते हुए भविष्य से पूछा "वैसे तुम करते क्या हो?"
जवाब मिला "पढ़ रहा हूँ।"
"कौनसी क्लास में...?"
"बारहवीं विज्ञान.."
"अच्छा...विज्ञान..!!" अंधेरे ने अतिरिक्त जोर देकर शब्द दोहराये तो तंबू में रखी शीशीयाँ एक दूसरे की तरफ देखकर हँसने लगी।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 20, 2018 at 7:40pm

आद0 सुनील वर्मा साहब सादर अभिवादन। बढिया और संजीदा लघुकथा, बहुत बढ़िया लगा पढ़कर। इस उम्दा प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 7:33pm

जनाब सुनील साहिब ,अच्छी और आकर्षक लघुकथा हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by vijay nikore on March 19, 2018 at 11:59am

लघु कथा बहुत ही अच्छी लगी।

Comment by pratibha pande on March 18, 2018 at 2:56pm

इस संजीदा विषय पर सिर्फ  आप ही लिख सकते हैं I जिस गहनता और स्पष्टता की दरकार थी वो सब इस  में है  //"बारहवीं विज्ञान..// इस  एक पंक्ति  ने कितना कुछ कह दिया   ढेरों बधाई  इस सफल और धारदार कथा के सृजन पर 

Comment by Samar kabeer on March 17, 2018 at 6:13pm

जनाब सुनील वर्मा साहिब आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 16, 2018 at 5:20pm

ये हुई न लघुकथा। लघुकथा वाली बात। लम्बे अंतराल के राज़ की बात। आपकी बेहतरीन प्रतीकात्मक शैली की बेहतरीन सार्थक कटाक्षपूर्ण ऐसी रचना जो शिक्षकों, धर्मगुरुओं और युवा शिक्षित वर्ग को शर्मशार कर रही है, उनकी वास्तविकता बता कर सबक़ भी दे रही है चिंतन-मनन के लिए। तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और शुभकामनाएं मुहतरम जनाब सुनील वर्मा साहिब। 

बहके आत्मविश्वास रहित भयभीत आशंकित भविष्य के बिम्ब में वर्तमान वास्तविक अंधकार और उसके सहयोगी कारकों का बढ़िया चित्रण व बढ़िया कथ्य सम्प्रेषण!

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