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परिँदे बोलते नहीँ हैँ, लेकिन महसूस तो करते ही हैँ। इन्सान कुछ कहना चाहे तो उसके पास जुबान है किन्तु इन के पास नहीँ हैँ।इस गर्मी मे इन पंक्षीयो का प्यास से बुरा हाल हो रहा हैं। हमने तो धीरे-धीरे इनका प्राकृतिक जल स्रोत नष्ट कर दिया। ये बेचारे प्यास से मर रहे हैँ। आइये हम और आप मिलकर इनके लिये अपने छत पे, बालकनी मे, अहाते मे इनके लिए दाना-पानी रखे।इसमे अपना क्या जाता है। कवी जी ने सही लिखा है-
राम जी के चिरइ, राम जी के खेत।
खा ले चिरइ भर-भर पेट।।

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 6, 2010 at 6:47pm
गुरुनानक जी ने कहा था
राम दी चिड़िया राम दा खेत
चक्कों चिड़िया भर भर पेट|
Comment by Raju on March 30, 2010 at 8:59pm
Mahesh jee bahut badhiya PAHAL kiya hai aapne........
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on March 30, 2010 at 9:21am
bahut badhiay tarah se likha hai aapne mahesh jee......
chiriyo ka chahchana subah me to acchha lagta hi hai aur uske alawa bhi har samay acchah lagta hai.......
bahut badhiay pahal; hai mahesh jee
aisehi likhte rahiye...
aage bhi aapki isi tarah ki rachna ka intezaar rahega....

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 30, 2010 at 8:32am
हमारे आस पास शांत बातावरण मे चिडियों का चहचहाना मन को बहुत ही सुकून देने वाला होता है, इन्हे बचाना हमारा कर्त्तव्य है, आखिर ये पक्षी भी तो हमारे प्रकृति के अंग ही तो है, तो आइये महेश जी के इस पहल को हम सभी आगे बढ़ाये ....
Comment by Admin on March 30, 2010 at 8:27am
महेश जी, आपने बहुत ही बढ़िया तरीके से एक पहल के तरफ हम सब का ध्यान आक्रिस्ट कराया है, पशु पक्षी, पेड़ पौधों को बचा कर ही जीवन को बचाया जा सकता है तथा अपने परिश्थितिकी को बनाया रखा जा सकता है बहुत बहुत धन्यबाद इस पोस्ट के लिये .

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