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विगत -गत

कल कोने में दुबके सहमे

डरे डरे कुछ  लम्हे पाए

मैंने जा कर के सहलाया

झूठ सही पर जा बहलाया

कि मेरे होते न यूं डरो

परिचय दे ले बात करो  

 

सुन कर पल ने ली अंगडाई

व्यंग बुझी  सी हँसी थमाई

 

बोला कलंक से  कलुषित हो

आत्मग्लानि से झुका हुआ था

विगत साल हूँ रुका हुआ था

 

उत्सुक था क्या नया करोगे

मुझे भेज जब नया धरोगे

 

बच्चियों के चीत्कार रुकेंगे  

जुगनु संग व्यभिचार रुकेंगे

कृषकों को कुछ आस मिलेगी

इतिहास को श्वास मिलेगी

 

देख लिया सब एक माह में

मोहग्रस्त था अब जाता हूँ

आत्मग्लानि से झुका हुआ था

विगत साल हूँ रुका हुआ था

..............................................................................................

मौलिक  व अप्रकाशित 

 

 

 

Views: 562

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 28, 2018 at 7:48pm

सुंदर अभिव्यक्ति, हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 26, 2018 at 4:27pm

बहुत ही गहरी सार्थक रचना ..बधाई

Comment by vijay nikore on January 25, 2018 at 1:18pm

अति सुन्दर अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 24, 2018 at 9:10pm

उत्तमाभिव्यक्ति!हार्दिक बधाई

Comment by Mohammed Arif on January 24, 2018 at 8:15am

आदरणीया अमिता तिवारी आदाब,

                          बहुत ही सुंदर भावों अभिव्यक्ति का तोहफ़ा दिया है आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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