For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

विद्वता के पैमाने /लघुकथा

एथेन्स के प्रसिद्ध चैराहे पर सुकरात जोकर बन कर खड़ा था। जो भी आता उसके ठिगने कद, चपटी नाक, मैले-कुचैले पुराने कपड़े, निकली हुई तोंद और नंगे पैर को देख कर हँसे बिना न रह पाता। ‘‘कौन हो तुम?’’ भीड़ में से किसी ने पूछा।


‘‘एक दार्शनिक।’’ उसे लगा कि नाम बताने की अपेक्षा यदि वह दार्शनिक कहेगा तो लोग उसे कुछ गंभीरता से लेंगे मगर वह गलत था। चैराहा एक बार पुनः ठहाकों से गूँज उठा।

‘‘वो देखो, दार्शनिक उन्हें कहते हैं।’’ विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर्स को बाहर आते देख एक छात्र ने उनकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

कोट-पैण्ट और टाई पहने हुए उन सभी प्रोफेसर्स के हाथ में एक ब्रीफ़केस था। भीड़ देखकर वो भी उधर ही आ गये। उस छात्र ने पुनः कहा, ‘‘सर! ये पागल अपने को दार्शनिक कहता है।’’

प्रोफेसर्स ने उस बदसूरत आदमी को ऊपर से नीचे तक देखा और समवेत स्वर में पूछा, ‘‘किसी काॅलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं आप?’’

‘‘नहीं।’’ प्रोफेसर्स ने पुनः सवाल पूछा, ‘‘तो क्या किसी अन्य शैक्षिक संस्थान से जुड़े हैं?’’

जवाब फिर से वही था इसलिए सवाल एक बार और पूछा गया, ‘‘आपने कोई किताब या शोध-पत्र आदि लिखा है? किसी काॅन्फ्रेन्स में गये हैं? कितने सेमिनार अटेण्ड किया है?’’

ऐसे भारी-भरकम शब्द सुनकर उसका दिमाग चकराने लगा। किसी तरह ख़ुद को संभालते हुए उसने कहा, ‘‘एक भी नहीं।’’

प्रोफेसर्स समझ गये कि यह किसी काम का आदमी नहीं है इसलिए वो थोड़ा पीछे हट गये। मगर उस लम्बे कद के प्रोफेसर को अभी भी उम्मीद

थी। उसने अपनी टाई को ठीक किया और झुकते हुए पूछा, ‘‘तुमने कहीं से पीएच०डी० तो की होगी?’’

बार-बार न कहने से अब उसे शर्म महसूस हो रही थी। उसका दिल किया कि इस बार वह हाँ कह दे मगर ‘‘नहीं’’ ही कह पाया। एक बार फिर सब ठहाके मार-मार के हँसने लगे।

अन्ततः एक आख़िरी टिप्पणी सबसे वृद्ध प्रोफेसर ने की, ‘‘तुम विद्वता के किसी भी पैमाने पर ख़रे नहीं उतरते। तुम दार्शनिक हो ही नहीं सकते।’’

उसका दिल टूट गया। वह पूरी तरह निराश हो चुका था। इतने सालों में पहली बार उसकी नज़र अपने गन्दे कपड़ों और नंगे पाँव पर गयी। उसने प्रोफेसर्स के चमचमाते सूट-बूट को देखा और फिर अपना सर झुका कर चुपचाप वहाँ से चला गया।

वह थोड़ी ही दूर गया होगा कि अचानक उसके अन्दर से आवाज़ आयी, ‘‘मैं सिर्फ़ एक ही बात जानता हूँ और वो यह है कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ।’’ उसने पलट कर देखा, भीड़ अब भी उसकी तरफ़ हाथ दिखा कर हँस रही थी।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 144

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mahendra Kumar on January 24, 2018 at 7:24pm

बहुत-बहुत धन्यवाद आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. सादर आभार.

Comment by Mahendra Kumar on January 24, 2018 at 7:23pm

बहुत शुक्रिया आ. बृजेश  जी. हार्दिक आभार. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 23, 2018 at 8:27pm

हार्दिक आभार आ. विजय जी. सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2018 at 10:44pm

बेहतरीन सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब महेंद्र कुमार साहिब।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 2:37pm

बहुत बेहतरीन...ऐसी लघुकथा होनी चाहिए जो एक कसक सी छोड़ दे..और आपकी कथा इस कसौटी पर पूर्णतया कसी हुई है आदरणीय..सादर बधाई

Comment by vijay nikore on January 18, 2018 at 8:44am

बहुत ही सुन्दर लघु कथा। हार्दिक बधाई।

Comment by Mahendra Kumar on January 17, 2018 at 8:09pm

सादर आदाब आ. समर सर. जी, मुझे याद है. आप जैसे साहित्य अनुरागी को यदि मेरी लघुकथाएँ पसन्द आती हैं तो इससे बढ़कर दूसरी ख़ुशी मेरे लिए नहीं हो सकती. आपको यह लघुकथा पसन्द आयी, मेरा लेखन सार्थक रहा. आपका हृदय से आभारी हूँ. बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 17, 2018 at 8:05pm

लघुकथा पसन्द करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आ. अजय जी. मीर का शेर साझा करने के लिए हृदय से आभारी हूँ. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 17, 2018 at 2:25pm

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,बहुत उम्दा और प्रभावित करने वाली लघुकथा लिखी आपने,आपकी लघुकथाएं मुझे बहुत पसंद आती हैं,इसका इज़हार मैं आपसे पहले भी कर चुका हूँ,ये लघुकथा भी बेहद पसंद आई,कथानक,शिल्प हर दृष्टि से कामयाब,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Ajay Tiwari on January 16, 2018 at 9:02pm

आदरणीय महेंद्र जी,

सुकरात के प्रख्यात कथन को आधार बना ज्ञान के खोखले आधुनिक मानकों पर अच्छी टिप्पणी की है. हार्दिक बधाई.

इसे पढ़ते हुए मीर का एक शेर याद आया :

यही जाना कि कुछ जाना हाए

सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

क़मर जौनपुरी commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -7 ( गरीबों की लाशों में ढूंढें ख़ज़ाना)
"बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब समर कबीर साहब। आपकी इस्लाह सर आंखों पर। शह्र के मामले में आपकी नसीहत…"
40 minutes ago
Samar kabeer commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -7 ( गरीबों की लाशों में ढूंढें ख़ज़ाना)
"जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । ' कहे ना हक़ीक़त…"
1 hour ago
Samar kabeer commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -7 ( गरीबों की लाशों में ढूंढें ख़ज़ाना)
"//क्या यह ग़ज़ल के क्षेत्र में बड़ा दोष है या चलने लायक है।// 'शहर' आम बोल में वो लोग बोलते…"
1 hour ago
Samar kabeer commented on TEJ VEER SINGH's blog post सन्नाटा  -  लघुकथा  -
"जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,हक़ीक़त से क़रीब, उम्दा तंज़,वाह, बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर…"
2 hours ago
Vivek Raj commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -6 ( चल गया जादू सभी अंधे औ बहरे हो गए)
"जनाब क़मर साहब अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल फरमाएं"
4 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post सन्नाटा  -  लघुकथा  -
"हार्दिक आभार आदरणीय बबिता गुप्ता जी।"
6 hours ago
राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७१
"आदरणीया राजेश कुमारी जी, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहेदिल से शुक्रिया. सादर "
7 hours ago
क़मर जौनपुरी commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल -7 ( गरीबों की लाशों में ढूंढें ख़ज़ाना)
"हौसला आफ़ज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया जनाब तेज वीर सिंह साहब।"
7 hours ago
Munavvar Ali 'taj' replied to Rana Pratap Singh's discussion ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा-अंक100 में शामिल सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)
"मुहतरम राणा प्रताप साहिब गुज़ारिश है कि ग़ज़ल नं. 33 के सातवें शेर के सानी मिसरे में लफ्ज़ '…"
7 hours ago
Pradeep Devisharan Bhatt posted a blog post

"अहसास"

ज़िंदगी दी है खुदा ने,मुस्कुराने के लिएभूलना लाज़िम है तुमको,याद आने के लिए बेखयाली मे कदम फ़िर, खींच…See More
7 hours ago
babitagupta commented on TEJ VEER SINGH's blog post सन्नाटा  -  लघुकथा  -
"बेहतरीन रचना के माध्यम से कटाक्ष करती , कि हम भावी पीढी को किस तरह का संस्कार दे रहे है।हार्दिक…"
8 hours ago
babitagupta commented on babitagupta's blog post बदहाल जनता (तुकांत अतुकांत कविता)
"नमस्कार! , आदरणीय तेजवीर सरजी, समर सरजी, राजेश सरजी, रचना पर टिप्पणी करने व पसंद करने के लिए…"
8 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service